हिंदी छत्तीसगढ़ भारती

एक नई शुरुआत ( सुश्री कमला चमोला )

“श्रीकांत को कक्षा का मॉनीटर बनाया जाता है क्योंकि कक्षा के 85 प्रतिशत लड़कों ने उसके नाम का समर्थन किया है।” कक्षाध्यापक शर्मा जी ने यह घोषणा की तो सभी लड़के तालियाँ बजाने लगे। कक्षा में सिर्फ सुधीर ही ऐसा लड़का था जो तिरछी आँखों से श्रीकांत को घूर रहा था।

श्रीकांत ने उसकी ओर देखा तो उसने अकड़कर गर्दन दूसरी ओर घुमा ली। श्रीकांत मुस्करा पड़ा। उसे सुधीर से ऐसे ही व्यवहार की अपेक्षा थी। उसे इस शहर में आए छह माह होने को थे। उसकी शराफत और होशियारी से सभी लड़के प्रभावित थे। पढ़ाई में भी वह अच्छा था। सभी लड़कों के साथ उसकी दोस्ती हो गई थी। एक सुधीर ही था जो उससे बात करने में भी अपनी हेठी समझता था। श्रीकांत को लगता जैसे सुधीर मन-ही-मन उससे ईर्ष्या करता है। सुधीर हद दर्जे का गुस्सैल, अक्खड़ और शरारती किस्म का लड़का था। श्रीकांत को लड़कों से पता चला था कि वह गलत सोहबत में भी पड़ गया है। सभी उससे बात करने में कतराते थे। कक्षा की लड़कियाँ तो उसकी ओर नजर उठाकर भी नहीं देखती थीं जब पीरियड खत्म हुआ तो श्रीकांत सुधीर के पास जाकर बोला, “तुम्हें मेरा मॉनीटर बनना पसंद नहीं आया क्या?” “मॉनीटर बने हो, राजा नहीं- मॉनीटरी सँभालनी मुश्किल हो जाएगी तुम्हारे लिए और हाँ, मुझ पर रौब गाँठने की कोशिश भी मत करना वरना…।” श्रीकांत को एक अप्रत्यक्ष-सी धमकी देकर सुधीर चला गया।

सुधीर का व्यवहार अजीब-सा लगा श्रीकांत को। आखिर वह इस कदर बिगड़ क्यों गया है? अब वह दसवीं कक्षा में है, समझदार है, फिर गुंडों जैसी धमकियाँ क्यों देता है? कक्षा में उसने सुमेश से सुधीर के बारे में पूछा तो सुमेश बोला, “शरारती तो खैर सुधीर बचपन से ही था. फिर गलत संगत में भी पड़ गया। तब हम आठवीं कक्षा में थे। इसे सजा के रूप में पूरे स्कूल के सामने स्टेज पर खड़ा रखा गया। उस घटना के बाद सबने इससे बात करना कम कर दिया। सभी अध्यापक भी इसे गैर जिम्मेदार और बिगड़ा हुआ लड़का मानने लगे और फिर तो सचमुच सुधीर बिगड़ता ही गया। अब तो जैसे पूरा दादा ही बन गया है।”

सुमेश की बात सुनकर श्रीकांत सोच में डूब गया। उसे लगा सुधीर को गिरावट की इस हद तक पहुँचाने में शायद कक्षा के लड़के-लड़कियों और अध्यापक सभी का हाथ है। उसे सदा प्रताड़ना और डॉट ही सुनने को मिली है। प्रार्थना के समय उसे पूरे स्कूल के सामने खड़ा रखा गया। शायद इस सार्वजनिक अपमान ने ही उसका स्वभाव विद्रोही बना दिया है। अब अगर उसे जिम्मेदार लड़का मानकर काम सौंपे जाएँ, हर काम में उसका सहयोग और सलाह लेकर उसे भी अपने साथ शामिल किया जाए तो शायद वह सुधर जाए।

सुधीर के कारण श्रीकांत को मॉनीटर का काम सँभालने में बड़ी मुश्किल हो रही थी । सुधीर ऐसी हरकतें करता जिससे श्रीकांत को परेशानी हो और उसे डॉट पड़े। जब तक ब्लैक बोर्ड साफ करके श्रीकांत चॉक लेकर आता, सुधीर ब्लैक बोर्ड पर हास्यास्पद कार्टून बना देता।

अध्यापक के आने से पहले वह और उसके दो-एक साथी इस कदर शोर मचाते कि मॉनीटर यानी श्रीकांत को तगड़ी डॉट खानी पड़ती। मगर श्रीकांत ने कभी अध्यापक से सुधीर की शिकायत नहीं की।

स्कूल का वार्षिकोत्सव करीब आ रहा था। कक्षाध्यापक प्रायश्चित’ नाटक के लिए पात्रों का चयन कर रहे थे। श्रीकांत को राणा की भूमिका के लिए चुना गया तो वह तुरंत खड़ा होकर बोला, “सर, शक्ति सिंह की भूमिका के लिए आप सुधीर को ले लीजिए, उसकी आवाज़ में गंभीरता और गहराई है। वह यह भूमिका अच्छी तरह कर सकता है।”

“मगर ।” अध्यापक संदेह प्रकट करने लगे तो श्रीकांत उनकी बात काटकर बोला. “मानता हूँ कि नाटक में प्रमुख पात्र शक्ति सिंह ही है, पर उसे सुधीर पूरी निष्ठा, लगन से कर पाएगा, इसका मुझे पूरा विश्वास है सर ।” इस तरह शक्ति सिंह की भूमिका के लिए सुधीर को चुन लिया गया। सुधीर कई वर्ष बाद स्कूल के किसी आयोजन में भाग ले रहा था। वह कृतज्ञता भरी नजरों से बीच-बीच में श्रीकांत को देख लेता था।

प्रतिदिन नाटक का अभ्यास होता था। सुधीर अब अपेक्षाकृत शांत नज़र आता था। एक दिन अभ्यास में कुछ देर हो गई। अँधेरा घिरने लगा था। अध्यापक बोले, “श्रीकांत, अँधेरा हो रहा है, तुम लोग तो चले जाओगे पर पहले तुम लोगों को इन लड़कियों को इनके घर तक पहुँचाना होगा।”

“आप चिंता न करें सर, हम लोग इन्हें घर तक पहुँचा कर आएँगे। रीता और नंदा को

मैं छोड़कर आऊँगा, वंदना और मीरा को रवि और गीता व सुप्रिया को सुधीर ” “क्या?” गीता और सुप्रिया सुधीर के नाम से चौंक पड़ीं सुप्रिया बोली, “तुम्हारा दिमाग तो खराब नहीं है. श्रीकांत। हमें सुधीर जैसे बदमाश और बिगड़े हुए लड़के के साथ भेज रहे हो?”

“सुधीर बदमाश नहीं है.” श्रीकांत बोला। “मै इतने दिनों में उसे अच्छी तरह से जान गया

हूँ। हर काम में उसे गैर-जिम्मेदार और बिगड़ा हुआ मानकर सभी ने उसे अलग-थलग रखा है। अब हमें उसे अपने करीब लाना है, उसमें जिम्मेदारी की भावना पैदा करनी है। गीता और सुप्रिया, तुम दोनों विश्वास रखो, सुधीर तुम्हें हम सबसे अधिक सुरक्षित ढंग से घर तक छोड़कर आएगा। इसके बाद उसने सुधीर को आवाज लगाई – “सुधीर! जरा इधर आओ। हम सबको इन लड़कियों को घर तक पहुँचाने की जिम्मेदारी

निमानी है। मैं रीता और सुनंदा को साथ ले जा रहा हूँ, तुम गीता और सुप्रिया को छोड़ आओ।” श्रीकांत की बात पर सुधीर फटी-फटी आँखों से श्रीकांत को देखने लगा। श्रीकांत ने उसे इस लायक समझा, यह सोचकर उसकी आँखों में हल्की-सी नमी उतर आई, जिसे छिपाकर वह बोला, “क्या गीता और सुप्रिया तैयार है?”.

“हाँ-हाँ, क्यों नहीं, चलो, सुप्रिया मुस्कराकर बोली।

अगले दिन गीता ने श्रीकांत से हँसकर कहा, “भई, जबर्दस्त बाडीगार्ड है सुधीर हमें भी भीड़ से ऐसे बचाकर ले जा रहा था, जैसे हम काँच की गुड़ियाँ हों जो किसी के छूने भर से बिखर जाएँगी। सच, सुधीर का यह रूप तो हमने कल पहली बार देखा।”

श्रीकांत के होठों पर एक मुस्कान – सी आ गई। सुधीर को सुधारने के लिए उसके कदम सही दिशा में उठ रहे हैं। वार्षिकोत्सव सफल रहा और नाटक में जब सुधीर को सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का पुरस्कार मिला तो हॉल में देर तक तालियाँ गूंजती रहीं। सुधीर के चेहरे पर संकोच भरा गर्व का भाव था।

सभी छात्र-छात्राओं को स्कूल की ओर से पिकनिक पर ले जाया जा रहा था। सभी को पंद्रह-पंद्रह रुपए जमा करने थे। श्रीकांत के पास सारे छात्र पैसा जमा करने लगे तो वह “मुझे और भी कई काम करने हैं, तुम लोग अपने पैसे सुधीर के पास जमा करो।” बोला “मेरे पास?” सुधीर चौंक पड़ा। अभी तक उसके साथ चोर जैसा शब्द जुड़ा था। वह

सोचने लगा, क्या श्रीकांत को पता नहीं कि एक बार मैं फीस के पैसे चुराते हुए पकड़ा गया था। “हाँ, पैसे तुम ही इकट्ठे करोगे, सुधीर,” श्रीकांत बोला, “बाद में वर्मा सर के पास जमा कर आना )” श्रीकांत तो बाहर चला गया पर सुधीर हतप्रभ-सा बैठा था खिड़की से श्रीकांत ने झाँका तो खामोश सोच में निमग्न देख उसके होठों पर एक मुस्कान आ गई।

सुधीर का स्वभाव अब दिनोंदिन बदल रहा था। अक्खड़ता की जगह अब उसकी बातों में सौम्यता आने लगी थी। गाली-गलौज और लड़ाई भी कम हो गई थी। उसके अंदर आए इस परिवर्तन को सभी लड़के लक्ष्य कर रहे थे।

एक दिन श्रीकांत कक्षा के अपने सहपाठियों से बोला, “आज सुधीर का जन्मदिन है; शाम को हम लोग उसे बधाई देने उसके घर चलेंगे।”

“लेकिन मेरी माँ ने तो उसके घर जाने को सख्त मना किया हुआ है.” नीरज बोला। “लेकिन यह तब किया था जब वह सचमुच बिगड़ा हुआ था और अब तुम सभी देख रहे हो कि वह एक अच्छा लड़का बनने के प्रयास में जुटा है। कक्षा के लड़के उसे बिगड़ा जानकर शुरू से ही उससे अलग-थलग रहे. इसी कारण वह और भी बिगड़ता गया। अब हम लोग उसके करीब जाएँगे तो उसे भी सहारा मिलेगा ऊपर उठने में।”

शाम को दरवाजे पर खट-खट् हुई तो सुधीर ने दरवाजा खोला। बाहर श्रीकांत सहित कक्षा के 8-10 लड़कों को खड़ा देख वह सकपका गया। सभी मुस्कराकर बोले, “”जन्मदिन मुबारक हो सुधीर…।”

लेकिन तुम लोगों को पता कैसे चला कि आज मेरा जन्मदिन है?”

सुधीर अब भी उलझन में खड़ा था। इस पर श्रीकांत बोला, “ताड़ने वाले कयामत की नजर रखते हैं जनाब। जब परीक्षा के लिए तुम फार्म भर रहे थे तब मैंने तुम्हारी जन्मतिथि देख ली थी। अच्छा, अब अंदर आने को भी कहोगे या बाहर ही खड़ा रखोगे?”

“ओह-आओ आओ अंदर आ जाओ।” सुधीर के चेहरे से प्रसन्नता छलक रही थी। सबने तोहफे मेज पर रख दिए। तभी सुधीर की माँ आई और बोली, “तुम लोगों ने बहुत अच्छा किया जो इसके जन्मदिन पर आए चार-पाँच साल से इसने जन्मदिन मनाना ही छोड़ दिया था। तुम लोग बैठो, मैं पकौड़े तलती हूँ।”

देखिए आंटी, कहीं बेसन कम न पड़ जाए, हम लोग बिना भरपेट खाए टलने वाले नहीं.” श्रीकांत बोला तो सुधीर की माँ मुस्कराकर बोली, “घबराओ मत, बहुत बेसन है।” पकौड़े खाते हुए सभी लड़के खिलखिलाकर हँस रहे थे। सुधीर भी खुलकर बातचीत में

हिस्सा ले रहा था। उसके चेहरे पर वही सौम्यता और भोलापन था जो इस उम्र के किशोरों में

होता है। श्रीकांत को लगा जैसे वह सुधीर का कोई और ही रूप देख रहा है। अगले दिन वह कक्षा में खड़े होकर शर्मा सर से बोला, सर, मुझे मॉनीटर बने लगभग तीन माह होने को हैं। अब जिम्मेदारी में सुधीर को सौंपना चाहता हूँ।”

“ठीक है. आज से सुधीर मॉनीटर होगा।” शर्मा जी का निर्णय सुनकर सभी लड़के तालियाँ बजाने लगे। सुधीर सकुचाया-सा आँखें झुकाए बैठा था। बीच-बीच में वह कृतज्ञता भरी नजर श्रीकांत पर भी डाल रहा था, मानो कह रहा हो, “मुझे इस ऊँचाई तक पहुँचाने में तुम्हारा ही हाथ रहा है।” श्रीकांत भी उसकी मौन भाषा बखूबी समझ रहा था।


शब्दार्थ:- कृतज्ञता किए हुए उपकार को मानने का भाव, एहसानमंदी, हतप्रभ-निस्तेज, कांतिहीन, आश्चर्यचकित कयामत-महाप्रलय, आफत, सोहबत-संगति, संसर्ग, कतराना- किसी वस्तु या व्यक्ति को बचाकर किनारे से निकल जाना, शरारती-नटखट, पाजी, प्रायश्चित- पश्चाताप, अक्खड़ता किसी का कहना न माननेवाला, उग्र, उद्धत, बखूबी भली भाँति, अच्छी तरह से पूर्ण रूप से पूर्णतया ।


अभ्यास


 पाठ से 

1. श्रीकांत को कक्षा का मॉनीटर क्यों बनाया गया ?

उत्तर-

2. श्रीकांत को मॉनीटर बनाए जाने पर सुधीर की क्या प्रतिक्रिया थी ?

उत्तर-

3. श्रीकांत को कक्षा के साथी सुधीर से किस प्रकार के व्यवहार की अपेक्षा थी ?

उत्तर-

4. सुधीर मन-ही-मन श्रीकांत से ईर्ष्या क्यों करता था ?

उत्तर-

5. किस घटना के बाद सबने सुधीर से बात करना कम कर दिया था ?

उत्तर-

6. सुधीर के बारे में छात्रों और शिक्षकों की क्या मान्यताएं थीं ?

उत्तर-

7. सुधीर ऐसा कौन-सा काम करता था जिससे श्रीकांत को मॉनीटर का काम सम्हालने में परेशानी होती थी

उत्तर-

8. सुमेश की बात सुनने के बाद श्रीकांत सुधीर की गिरावट के लिए किसको उत्तरदायी मानता है और क्यों ?

उत्तर-

9. सुधीर पर विश्वास करके श्रीकांत ने उसमें क्या परिवर्तन लाया ?

उत्तर-

10. सुधीर के व्यवहार और व्यक्तित्व में कैसे परिवर्तन आया ?

उत्तर-

11. सुधीर की आँखों में नमीं क्यों उतर आयी ?

उत्तर-

12 “श्रीकांत उसकी मौन भाषा को बखूबी समझ रहा था पंक्ति का भाव अपने शब्दों में स्पष्ट कीजिए।

उत्तर-

13. सुधीर का परिवर्तित रूप गीता और सुप्रिया ने कब महसूस किया ?

उत्तर-

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