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अपन चीज के पीरा ( संकलित ) Apne Cheese Ke Pira (Compiled)

परसराम के जस नाम तस काम जेन मेर नहीं, तेन मेर लाठी अँटियाथे अउ बात-बात म अँगरा उगलथे। सोज गोठियाय ल तो जानय नहीं जुच्छा अटेलही मारथे। परसराम जेन लहो लेथे तेन तो लेथे, ओकर ले जादा लहो लेथे ओकर गाय गोदवरी परसराम करा कोरी भर गाय हे फेर गोदवरी के अलगे मिजाज है ढिल्ला चर चर के खूब मोटाय हे लाली रंग बड़े-बड़े सींग, हुमेले बर आघू छिल-छिल दिखथे ओखर सरीर। काठा भर के काचर कसेली भर दूध देथे एकरे भरोसा परसराम के गोसइन दसरी ह मार अंग भर गहना ओरमाय हे। बड़ खुस हे परसराम अउ दसरी खुस नइ है त ऊँकर बेटा रमेसर। रोज-रोज के चदी ले हलाकान रहिथे। ददा-दाई संग बातिक बाता घलो हो जाथे। फेर नइ सुधरने वाला हे परसराम।

आज फेर बड़े बिहनिया ले रुपउ ह बद्दी दे बर आय हे। ओकर कछार-बारी के भाँटा-मिरचा के फेर सत्यानास कर दे हे गोदवरी ह। फूले-फरे के दिन म चर दे हे रुपउच ह नहीं, तीर-तकार के जम्मो खेत-खार वाले गोदवरी के मारे हलाकान हैं। गोदवरी कोजनी कइसे मनखे कस अपन मुड़ के भार राचर ल उसाल देथे अउ घुसर जाथे बारी-बखरी म कौनो गेम नइ पाय अउ थोरको ककरो आरो पाथे, तहाँ ले पूछी उठाके पल्ला भागथे। कोनो ओकर पार नइ पाय पल्ला भाग के कोठा म घुसर जाथे। बद्दी देवइया ल परसराम उल्टा गारी देवत कहिथे-तोर बारी म गाय ह चरत रहिस त पकड़ के लाने हस का ? बड़ा आय हस बद्दी देवइया मंधारे ल देहूँ लउठी म भाग जा।” रुपउ मने-मन म संकलप लेथे, एक न एक दिन पकड़ के देखाहूँ तोर गाय ल ।

बारी जाते साठ रुपउ भिड़गे गाय पकडे के जतन म धरिस कुदारी लानिस झउहा-रापा। जैन मेर ले गाय बारी म बुलके बर पइधे रहय, तेने मेर गढ़हरा खने वर भिडगे । बासी-पेज खाय ल छोड़ दिस। ओला तो परसराम के बात लगे रहय। बने गढ़हरा खन के ओला डारा-पाना म तोप दिस तमे घर गिस। एती संझा बेरा गोदवरी बरदी ले लहुटिस त परसराम गोदवरी ल दुहिस-बाँधिस अउ सोवा परती म गाय के गेरवा ल छटका दिस। चलिस गोदवरी अपन ठीहा म लगथे गोदवरी असन गाय के चाल-चलन ल देखके सियनहा मन हाना पारे होही-पइथे गाय कछारे जाय। रुँघना ले बुलकत गोदवरी गढ़हरा म झपागे भकरस ले बाजिस गोदवरी बॉय Sss कहिके नरिअइस। रुपउ कुँदरा के बाहिर कउडा मेर बइठे आगी तापत रहय। रुपउ जान डरिस, अब कहाँ जाही? एक मन डराय कहूँ गाय के गोड़ टूट जाही त उल्टा मोर करलइ हो जाही। मर जाही त गउ हत्या लगही। आधा बल, आधा डर करत आके रुपउ देखथे त गोदवरी गढ़हरा म अॅवरी-भँवरी बियाकुल घूमत रहय।

मुँहझुलझुल बिहनिया परसराम खोर के कपाट ल खोलथे त गोदवरी नइ रहय। परसराम कहिथे-“आज गोदवरी कइसे नई अइस ओ, रमेसर के दाई ?”दसरी ह कहिथे-“को जनी हो। मोर मन तो भुस-भुस जाथे। कहुँ रुपउ ह बाँध-छाँद तो नइ दिस होही।” परसराम कहिथे-“का ला? गोदवरी ल ? ओकर दस पुरखा आ जही तभो गोदवरी ल नइ बाँध सकय”

एती बारी के गढ़हरा म अभरे गोदवरी बछरु के मया म बाँय-बॉय नरियावय। बाहिर बट्टा अवइया- जवइया, नहवइया कतकोन मनखे रुपउ के बारी म सकलागें समेलाल ह कहिथे-वाह रुपउ ! आज अच्छा फाँदा खेले। आज गरब उतरही परसराम के। कहाँ जाही ? गाय ल खोजत- खोजत सर्वांगे आही।” ठउँका ओतके बेर तेंदूसार के लाठी धरे परसराम आगे देखथे, गाय गढ़हरा म गिरे परे हे परसराम ल देखके गोदवरी बॉय बॉय नरियाय लागिस। रुपउ कहिथे-“कइसे परसराम कतका दिन ले ककरो लइका के मुँह म पैरा ल गोजबे मोर गाय ल कब पकड़े हस कहिके अँटियावस, अब बता।” परसराम के मन म आगी धधकय, फेर का करे चुपेचाप रहय। छक्का-पंजा बंद मूड़ी ल नवाय रहय। समेलाल कहिथे- “गाँव भर के खेत-खार, बारी-बेला के बहुत बिंदरा-बिनास करे हस तैहा अउ तोर गाय ह। अब काय कहिथस बोल। अभो गरजबे ? गाँव में रहना है त बने रह खेती-खार के चरइ अउ उपर ले अँटियइ नइ बने।”

कोनो बतइन त दसरी अउ रमेसर घलो बारी म आ गें। रमेसर मने-मन भारी खुश होत रहय। चलो आज चोर पकड़इस ददच आय त अनियाँव के पाट थोरे दाबबे अनियाँव त अनियाँव होथे। एक झन सियान कहिथे-“इही मेर नियाँव होना चाही परसराम गजब अँटेलही बघारथे। मसमोटी मारथे। आज आइस ऊँटवा पहाड़ तरी ये ला डाँड़े ल परही। एकर भरमस टूटना चाही।” ततके म दसरी जेन पहिली फुनुन-फुनुन करेगारी बखाना दे, तेन हाथ जोर के कहिथे- “ददा हो, गलती होगे। बछरू भूख के मारे नरियावत हे। गाय ल निकाल देव। जेन नियाँव करहू, पाछू करत रहू।” समयलाल कहिथे- “नहीं नियाँव तो अभी होही भउजी तुहर धरे के न बाँधे के। “परसराम उपरछावा कहिये-“जय ददा, जेन डौड़ बाँधहू में कसूरवार हैव देहूँ। चार झन सुनता होके परसराम ल दू सौ रुपिया डौंडिन अउ बरजिन- आज ले काकरो खेत-खारस घराबे झन, गाय ल डिलवे झन समझे।” दसरी तुरते दू सौ रूपिया लान के पटाइस गोदवरी ल निकालिन अउ घर आ गे

एक दू अठोरिया काही नइ जनइस परसराम गाय ल बाँध के राखे रमेसर सोचिस- चलो अच्छा है ददा के बेवहार बदलिस पर के खेत-खार चराय ले पेट नइ गरय, उल्टा सराप लगथे। एती दिल्ला घरे घरे टकराहा गोदवरी अब दुबराय लागिस। घर के चारा औला औलहाय नहीं। गाय के पक्ती-पक्ती झके लागिस। दूध घलो सुखाय लगिस दसरी घलो दुबराय लागिस। चोर ह चोरील छोड़ दिही त ओला कल नई परय, तइसे परसराम के हाल सोवा परती गोदवरी करा जाय अउ ओकर गेरवा न छटकाय के उदिम करे। ओ एक छिन सोचय-नहीं अपजस लेना ठीक नइ है। गेरवा छोरे बर ओकर हाथ ह ठोटके दूसर छिन सोचे-चरन दे न रोज-रोज धोरे पकड़ाही ठोटकत-ठोटकत एक दिन ओकर हाथ ले फेर गेरवा छूटगे। गोदवरी फेर दिल्ला। फेर बददी,रमेसर ल बड़ा दुख होय। एक दिन रमेसर के अपन दाई-ददा संग बनेच झगरा होगे। परसराम कहि दिस– “हरिचंद बने म पेट नइ भरे बेटा। रमेसर कहिथे-“नहीं ददा। सबला अपन चीज के पीरा है। कोनो तोर बारी-बेला, खेत-खार ल चराही त तोला नइ बियापही ? तोला नई पिराही का ?” “वाह रे! मोर धर्मात्मा बेटा” कहिके परसराम हाँस दिस। परसराम के हाँसी रमेसर के हिरदे म बैमूर काँटा कस गड़गे।

अदुरिया पाहू गाँव म मड़इ होइस । रतिहा दइहान म नाचा होत रहिस। जेवन करके सब झन नाथा देखे ल चल दिन दसरी ह अपन टूरी ल भेज के पहिली ले आघू में पोता बिछ्या दे रहिस। लइका ल घरके उहू पहुँचगे नाचा देखे ल परछी म सोये रमेसर टुकुर-टुकुर कोजनी का ला देखत रहय परसराम कहिथे-“नाचा देखे ल नइ जास रमेसर ? रमेसर कहिथे- अच्छा नइ लगे ददा, नइ जाँव।” “ले नइ जास त तैय घर ल राख मैं जात हैव एकात गम्मत देख के आहूँ। अइसे कहिके परसराम बंडी पहिरत निकलिस कोठा डहर गिस अउ गोदवरी के गेरवा ल छटका दिस गोदवरी निकलगे अपन बूता म अउ परसराम नाचा डहर निकलगे। रमेसर मन म सोचथे, आज तो कुछ उदिम करेच ल परही। अपन जिनिस के का पीरा होथे, ये तो ददा ल सिखोयेच ल परही।

रमेसर उठिस अउ कोठा म जाके सब्बो गाय-गरुवा ल ढिल के अपने बारी म ओइला दिस भाँटा, मिरचा फूलत-फरत रहय सेमी के नार घऊदे रहय, तेमा झोफ्फा-झोफ्फा सेमी झूलत रहय। तीर म धनिया धलो महमहात रहय। जम्मो गरुवा अभर में घर-बारी म उमान कस चारा घरे लगिन। जम्मो जानवर मिलके बारी ल खुरखुद कर दिन रात पछलती रमेसर उठके सबो जानवर ल कोठा म ओइलाके बाँध दिस अउ आके सुतगे।

नाचा देखत दसरी ल नींद आय लागिस तहाँ उठ के आगिस थोरिकेच पाछू परसराम घलो आगे लइका मन नाचा देखते रहिन। बिहनिया परसराम उठके बारी डहर गिस त बारी ल देखके अकबकागे। दसरी ल बारी म लेग के देखाथे खुरखुद बारी ल देख दसरी ह रोय लागिस। अउ रो-रोके सरापे-बखाने लागिस”काकर गरुवा आय तेन सरी भौटा मिरचा, सेमी ल चर के बारी के बिंदरा-बिनास कर दिस। ओकर डेहरी म दिया झन बरतिस। ओला खोजे पसिया झन मिलतिस।” परसराम घलो बेकलम-बेकलम गारी बके लागिस

एती रमेसर खटिया ले उठिस अउ बारी डहर जाके दाई ल कहिथे-“काकर डेहरी के दिया ल बुझावत हस दाई ? तैं सरापत बखानत हस दाई त तोरे डेहरी के दिया बुताही, तोरे गाय-गरुवा ह बारी ल चरे हे अउ मैं चराय हॅव आज तुहरे गाय-गरुवा ह, तुहर बारी-बेला ल चरे हे त तुहला कतका बियापत हे। हमर गाय दूसर के बारी-बेला ल चरथे त का ओला नइ बियापत होही ? सबके पीरा एक होथे ददा, सबके मया एक होथे दाई। अपन बरोबर सब ला जानिस अड़ सब ला एके मानिस।”

रमेसर के सियानी गोठ ल सुनके ककरो बक्का नइ फूटिस। आज परसराम अउ दसरी अपराधी कस खड़े रहिन। उहू मन ला अपन करनी के ज्ञान होगे। उत्ती डहर ले उक्त सुरुज के रूप आज नवाँ-नवाँ लागत रहिस।


अभ्यास


पाठ से

1. परसराम के सुभाव कइसे रहिस ?

उत्तर-

2. गोदवरी ह काकर बारी में जा के चरय ?

उत्तर-

3. रुपउ ह गोदवरी ल पकडे खातिर का जतन करिस ?

उत्तर-

4. रुपउ का सोंच के डर्रात रहय ?

उत्तर-

5. गाँव वाले मन परसराम ल का डाँड डॉडिन अउ ओला का चेतइन ?

उत्तर-

6. रमेसर ह अपन दाई-ददा ले का बात बर बातिक बाता होवय ?

उत्तर-

7. रमेसर ह नाचा देखे बर काबर नइ गिस ?

उत्तर-

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