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कटुक वचन मत बोल ( श्री रामेश्वर दयाल दुबे ) Do not speak harsh words (Shri Rameshwar Dayal Dubey)

दास प्रथा के दिनों में एक मालिक के पास अनेक गुलाम थे, जिनमें एक था लुकमान । तुकमान था तो गुलाम, किन्तु वह बड़ा बुद्धिमान था। उसकी प्रशंसा इधर-उधर फैलने लगी। एक दिन उसके मालिक ने उसे बुलाया और कहा- “सुनते हैं, तुम बहुत होशियार हो। मैं तुम्हारा इम्तहान लूँगा। अगर तुम कामयाब हो गए, तो तुम्हें गुलामी से छुट्टी दे दी जाएगी। अच्छा जाओ। एक मरे हुए बकरे को काटो और उसका जो हिस्सा सबसे बढ़िया हो, उसे ले आओ।” लुकमान ने वैसा ही किया। एक बकरे को कत्ल किया और उसकी जीभ लाकर मालिक

के सामने रख दी। कारण पूछने पर लुकमान ने कहा- “अगर शरीर में जीभ अच्छी हो, तो फिर

सब अच्छा-ही-अच्छा है।”

मालिक ने कहा- “अच्छा, इसे उठा ले जाओ और अब बकरे का जो हिस्सा सबसे बुरा हो, उसे ले आओ।” लुकमान बाहर गया, लेकिन थोड़ी देर में उसने उसी जीभ को लाकर मालिक के सामने फिर रख दिया। कारण पूछने पर लुकमान ने कहा- “अगर शरीर में जीभ अच्छी नहीं है, तो फिर

सब बुरा-ही-बुरा है।” एक दूसरी घटना है। एक जिज्ञासु चीनी दार्शनिक कन्फ्यूशियस के पास पहुँचा और उसने

उनसे पूछा- “यह बताइए कि दीर्घजीवी कौन होता है?”.

वृद्ध कन्फ्यूशियस मुस्कराए और बोले- “जरा उठकर मेरे पास आइए और मेरे मुँह में देखिए-जीम है या नहीं? जिज्ञासु ने देखकर कहा- “जी हाँ, जीभ तो है।”

कन्फ्यूशियस ने फिर कहा- “अच्छा, अब देखिए कि दाँत हैं या नहीं?” जिज्ञासु ने देखकर कहा-” दाँत तो एक भी नहीं है।” अब कन्फ्यूशियस ने कहा-“जीभ तो दाँत से पहले पैदा हुई थी। उसे दाँतों से पहले जाना चाहिए था। ऐसा क्यों नहीं हुआ?”

“मेरे पास इसका कोई जवाब नहीं है। आप ही बताइए।”

कन्फ्यूशियस बोले- जीन कोमल है, दाँत कठोर हैं। जिसमें लचीलापन होता है, जो नम्र

होता है, वह अधिक समय तक जीता है, जीवन में जीतता है।” ये दो कहानियों हैं, किन्तु एक ही सत्य को उद्घाटित करती हैं और वह यह कि जीवन में वाणी का बहुत बड़ा महत्त्व है।

• वाणी तो सभी को मिली हुई है, परन्तु बोलना किसी-किसी को ही आता है। बोलते तो सभी हैं, किन्तु क्या बोलें, कैसे शब्द बोले, कब बोलें-इस कला को बहुत कम लोग जानते हैं। एक बात से प्रेम झरता है, दूसरी बात से झगड़ा होता है। कड़वी बात ने संसार में न जाने कितने झगड़े पैदा किए हैं। जीभ ने दुनिया में बहुत बड़े-बड़े कहर ढाए हैं। जीभ होती तो तीन इंच की है, पर वह पूरे छह फीट के आदमी को मार सकती है। संसार के सभी प्राणियों में वाणी का वरदान मात्र मानव को मिला है। उसके सदुपयोग से स्वर्ग पृथ्वी पर उतर सकता है और उसके दुरुपयोग से स्वर्ग भी नरक में परिणत हो सकता है। भारत विनाशकारी महाभारत का युद्ध वाणी के गलत प्रयोग का ही परिणाम था।

इसीलिए सदा-सदा से यह कहा जाता है कि किसी का हृदय अपनी कटुवाणी से विचलित मत करो। कदाचित मन्दिर और मस्जिद तोड़नेवाले को क्षमा मिल जाए तो मिल जाए, किन्तु हृदय मन्दिर तोड़ने वाले को क्षमा कहाँ ?

मधुर वचन है औषधि, कटुक वचन है तीर।

श्रवण द्वार हवै संचरै सालय सकल शरीर

कुटिल वचन सबसे बुरा, जारि करै तन छार

साधु वचन जल रूप है, बरसै अमृत धार।।

स्वर्गीय श्री लालबहादुर शास्त्री अपने विनम्र स्वभाव और मधुर वाणी के लिए प्रसिद्ध थे। प्रयाग में एक दिन उनके घर पर किसी नौकर से कोई काम बिगड़ गया। श्रीमती शास्त्री का क्रोध में आना स्वाभाविक था। उन्होंने नौकर को बहुत डाँटा और उसके साथ सख्ती से पेश आई। शास्त्री जी भोजन कर रहे थे। उन्होंने अपनी पत्नी से कहा- “अपनी जबान क्यों खराब कर रही

हो? लो, तुम्हें एक शेर सुनाऊँ कुदरत को नापसन्द है सख्ती जबान में

इसलिए तो दी नहीं हड्डी जबान में।”

और फिर मुस्कराते हुए शास्त्री जी ने आगे कहा- “जब एक शेर सुना है, तो एक दूसरा शेर भी सुन लो

जो बात कहो, साफ हो, सुथरी हो, भली हो। कड़वी न हो, खट्टी न हो, मिश्री की डली हो।।”

कहना न होगा, इन शेरों को सुनकर श्रीमती शास्त्री का क्रोध का पारा बहुत नीचे उतर गया था। यह बात स्वीकार करनी पड़ेगी कि सभी बातें ऐसी नहीं हो सकतीं, जो दूसरों को प्रिय ही लगें। सत्य कभी-कभी कड़वा होता है। कुछ बातें कहनी ही पड़ती हैं, किन्तु ऐसे अवसर पर होना यह चाहिए कि बात भी कह दी जाए और उसमें वह कडुवाहट न आने पाए, जो दूसरे के हृदय को विदीर्ण कर देती है। जरूरी नहीं है कि जीभ की कमान से सदा वचनों के बाण ही छोड़े जाएँ। वाक्चातुरी से कटु सत्य को प्रिय और मधुर बनाया जा सकता है।

किसी राजा ने स्वप्न देखा कि उसके सारे दाँत टूट गए हैं। ज्योतिषियों से फल पूछा। एक ने कहा- “राजन, आप पर संकट आने वाला है। आपके सब संबंधी और प्रियजन आपके सामने ही एक-एक कर मर जाएँगे।” दूसरे ज्योतिषी ने कहा.” आप अपने सारे संबंधियों और प्रियजनों से अधिक काल तक

संसार का सुख-ऐश्वर्य भोगेंगे।” दोनों कथनों का सत्य एक ही है, किन्तु पहले ज्योतिषी को कारावास मिला और दूसरे को पुरस्कार ।

सुबह-सुबह बुलबुल ने ताजे खिले फूल से कहा- “अभिमानी फूल! इतरा मत। इस बाग में तेरे जैसे बहुत फूल खिल चुके हैं।” फूल ने हँसकर कहा- मैं सच्ची बात पर नाराज नहीं होता, पर एक बात है कि कोई भी प्रेमी अपने प्रिय से कड़वी बात नहीं कहता।” बनाइए, नहीं तो यदि आपकी वाणी कठोर है, तीखी है, कर्कश है तो उसे सुधारिए, मीठी लोकप्रिय व्यक्तित्व का सपना अधूरा ही रह जाएगा।


अभ्यास


पाठ से

1. लुकमान ने बकरे के शरीर के सबसे अच्छे और बुरे हिस्से के चयन में जीभ को ही क्यों चुना?

उत्तर-

2. चीनी दार्शनिक कन्फ्यूशियस के कथन के जरिए लेखक क्या बताना चाहता है ?

उत्तर-

3. लेखक ने हृदय को तोड़ने वालों को क्षमा न देने की बात क्यों कही है?

उत्तर-

4. किसी के द्वारा प्रयोग किए कठोर वचन शरीर में चुभते हैं। क्यों ? उदाहरण के साथ स्पष्ट कीजिए।

उत्तर-

5. श्रीमती शास्त्री का क्रोध का पारा किस शेर को सुनकर नीचे उतर गया और क्यों ?

उत्तर-

6. श्री लालबहादुर शास्त्री जी ने शेर के माध्यम से अपनी पत्नी को क्या समझाने का प्रयास किया, स्पष्ट कीजिए।

उत्तर-

7. दोनों ज्योतिषियों ने राजा को एक ही बात कही, उनके कहने के तरीके में आपको क्या अंतर लगता है?

उत्तर-

8. लोकप्रिय बनने के लिए आपको क्या करना होगा ?

उत्तर-

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