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साहस के पैर ( श्री जयशंकर अवस्थी ) Feet of Courage (Shri Jaishankar Awasthi)

घटी अभी नहीं बजी थी कक्षा में चिल्ल-पों मची थी। लेकिन जैसे ही अचल ने प्रवेश किया एक सन्नाटा-सा खिच गया। वह आगे बढ़ा। तभी एक मोटा, नाटे कद का लड़का उठा और लपककर ब्लैकबोर्ड के सामने जा खड़ा हुआ होंठो पर मुस्कान लिए उसने कहना शुरू किया, “दोस्तो, भूगोल के मास्टर जी आते हैं तो अपने साथ नक्शा लाते हैं। नक्शे से हमें पता चलता है कि भारत कैसा है, दुनिया कैसी है। मगर इतिहास के मास्टर जी बेचारे क्या करें? अब इस साल हमारे कोर्स में तैमूर लंग वाला अध्याय है। मुझे चिंता थी कि आखिर हम कैसे जानेंगे कि तैमूर लंग कैसा था, कैसे उठता-बैठता था, कैसे चलता था। लेकिन भगवान की दया से -” और कक्षा ठहाकों, तालियों और सीटियों से गूंजने लगी। अचल को लगा किसी ने उसके दिल को मुट्ठी में दबोचकर मसल दिया है। वह जहाँ था, वहीं खड़ा रह गया। कक्षा में शोरगुल मचा था। एक आवाज आई. अपना भाषण तो तुमने अधूरा ही छोड़ दिया. बॉस।”

लेकिन तभी घंटी बज गई और मास्टर जी आ गए। शोरगुल थम गया। सब अपनी-अपनी जगह पर जा मास्टर जी ने हाजरी ली। फिर उन्होंने पुकारा, “अचल श्रीवास्तव!” अचल चौका; उसने खड़े होने के लिए वैसाखियाँ संगाली मास्टर जी कुर्सी से उठते हुए बोले, “बैठो, बेटे बैठे रहो। यह सब कैसे हो गया? तुम्हारा पैर …” पास आकर उन्होंने पूछा। अचल बैसाखियों के सहारे खड़ा हो गया था। उसने जवाब देने की कोशिश की लेकिन

गले में जैसे कुछ अटक गया। आँखें भर आई। “ओह.. खैर, छोड़ो बेटे इस बात को।” मास्टर जी द्रवित हो उठे। उन्होंने अचल की पीठ थपथपाई और वापस अपनी जगह पर आकर बोले- “देखो, तुम लोगों का यह नया दोस्त कितने बड़े दुर्भाग्य का शिकार हुआ है। अच्छा हो कि तुम लोग इसके साथ सहानुभूति रखो।”

लेकिन मास्टर जी के इस उपदेश का कोई असर नहीं हुआ था। पीरियड खत्म होने पर ज्यों ही मास्टर जी कक्षा से निकले, धमाचौकड़ी फिर शुरू हो गई। नाटे कद का यह मोटा सा लड़का फिर उठकर भाषण देने के अंदाज में ब्लैकबोर्ड के पास जा खड़ा हुआ था। घंटाघर में बारह बज गए पिता जी के खरटि गूंज रहे थे। माँ भी सो चुकी थीं.

लेकिन अचल की आँखों में नींद नहीं थी। तभी उसका मन साल भर पहले की एक घटना में उलझ गया।

पिता जी का तबादला हो गया था कितना खुश था अचल उस दिन रास्ते में एक बड़े स्टेशन पर गाड़ी रुकी थी। अचल पानी लेने उतरा था। नल पर काफी भीड़ थी। जब अचल का नंबर आया तो गाड़ी ने सीटी दे दी। पिता जी घबराकर चिल्लाए, “रहने दो अचल, अगले स्टेशन पर ले लेंगे।” वह दौडा। गाड़ी रेंगने लगी थी। घबराहट में उसका हाथ डिब्बे के हैंडिल पर जमा नहीं, पैर फिसला और स्टेशन पर कुहराम मच गया।

उसके बाद क्या हुआ, अचल को याद नहीं होश आया तो वह अस्पताल के बेड पर पड़ा था। सिरहाने माँ बैठी सिसक रही थीं। पिता जी गुमसुम खड़े थे। वह कुछ समझ नहीं पाया।

फिर जब उसे पता चला कि वह एक पैर गवाँ चुका है, तो वह तड़प उठा था। सारा अस्पताल उसे चक्कर खाता-सा लगा था।

और फिर वह दिन भी आया जब अचल बैसाखियों के सहारे चलता नए स्कूल में प्रवेश लेने गया। पिता जी भी साथ थे। कितनी ही आँखें उस पर गड़ गई थीं। लड़के उसे इस तरह से देखने लगे थे जैसे वह कोई जानवर हो। गुस्से और मजबूरी से काँप उठा था वह और अब कल उसे फिर स्कूल जाना था। फिर वही तीर जैसी फब्तियों, जहरीले ठहाके झेलने थे। उसे लग रहा था कि उसकी हिम्मत जवाब देती जा रही है। फिर क्या करे वह?

आखिर क्यों हँसते हैं लड़के उस पर? जरूर उन्हें कोई मजा मिलता होगा इससे वह चिढ़ता है, रोता है तो वे समझते होंगे कि उन्होंने उसे दबा लिया, हरा दिया। लेकिन अगर वह चिढ़े नहीं, रोए नहीं तो? अगर वह उन्हें जता दे कि वह अपने लेंगडेपन की कोई परवाह नहीं करता, तो उनका सारा मजा ही किरकिरा हो जाएगा बल्कि क्यों न वह खुद ही अपने आप पर हँसे? अपने लेंगडेपन पर हँसने का क्यों निमंत्रण दे उन्हें? तब वे समझ जाएँगे कि लँगडेपन की खिल्ली उड़ाकर उसे चिढ़ाने, सताने की कोशिश करना बेकार है; वह तो खुद ही अपनी टाँग को हँसने की चीज समझता है। उसके मुरझाए होठों पर मुस्कान खिल उठी। फिर पता नहीं, वह कब सो गया।

वही कल वाला माहौल था। अचल अभी-अभी कक्षा के दरवाजे पर पहुँचा ही था कि कक्षा सीटियों, ठहाकों और डेस्कों की थपथपाहटों से गूंजने लगी थी, “बा अदब! बा मुलाहिज़ा! होशियार ! शहंशाह तैमूर लंग तशरीफ ला रहे हैं।” वह मोटा, नाटा लड़का अपनी जगह पर खड़ा होकर चिल्लाया।

अचल ठिठका। कल वाली कायरता उसके अंदर सिर उठाने लगी थी। तुरंत उसने दाँत भींच लिए, फिर उसने अपने बिखरते साहस को सँजोया और मुस्कराने लगा और कक्षा के अंदर आ गया।

“अरे वाह, यह तो मुस्करा रहा है।” एक हँसी भरी आवाज उभरी। “क्यों बे! तुझे तैमूर लंग नाम पसंद आया क्या?” मोटा लड़का बोला। कक्षा ठहाकों से गूंज उठी। अचल की हिम्मत फिर एक बार टूटने लगी। उसने बड़ी मुश्किल से अपना दिल मजबूत किया खुलकर मुस्कराया और बोला, “बहुत।”

उसने देखा, कई लड़कों की आँखें आश्चर्य से फैल गई हैं। कक्षा का शोरगुल अचानक धीमा पड़ गया है। वह मोटा लड़का भी हक्का-बक्का रह गया था। वह खिसियानी-सी हँसी हँसकर बोला, “दोस्तो! सुना? यह कहता है कि इसे ‘तैमूर लंग’ नाम पसंद है, बल्कि बहुत पसंद है। क्यों न इसे हम – ” अचल ने उसे बात पूरी करने का मौका ही नहीं दिया। बैसाखियाँ टेकता हुआ उसके पास पहुँचा और मुस्कराकर बोला; “नाम में आखिर रखा ही क्या है जनाब! तैमूर लंग कहो या अचल, रहूँगा तो वही जो हूँ। है ना?”

सारी कक्षा सन्न रह गई। अचल का उत्साह दो गुना हो गया। वह कहता रहा, “अब देखो न, मेरा नाम है अचल नाम के अनुसार तो मुझे अडिग, अचल रहना चाहिए। पर जरा ये बैसाखियाँ हटा दो, फिर देखो तुरंत सचल न हो जाऊँ तो कहना।” कहते-कहते वह खिलखिलाकर हँस पड़ा।

उसके कहने का अंदाज ऐसा था कि कई लड़के हँस पड़े। मोटा लड़का भी हँस पड़ा, पर अब किसी की हँसी में वह पहले वाला तीखापन नहीं रह गया था।

तभी घंटी बज उठी। वह अपनी सीट की तरफ बढ़ गया। बगल में बैठे लड़के ने हैरत से उसे देखा और वह पूछ बैठा, “क्यों अचल, तुम्हें बुरा नहीं लगता कि हम लोग तुम्हें इतना चिढ़ाते हैं?”

अचल पहले तो चुप रहा, फिर एक गर्वीली मुस्कान के साथ बोला, “मैंने अपने ऊपर से गुजरती हुई ट्रेन को सहा है दोस्त! ये हल्के-फुल्के मज़ाक और फब्तियाँ भला क्या बिगाड़ पाएँगी मेरा।” और अब उसे लग रहा था कि उसके पैर हाड़-मांस के नहीं, लकड़ी के नहीं, साहस के हैं और साहस के कभी न थकने वाले पाँवों के सहारे वह जीवन की बीहड़ राहों पर बढ़ता चला जा रहा है।


अभ्यास


पाठ से

1. अचल कौन था और वह किस प्रकार शारीरिक चुनौती का शिकार हो गया ?

उत्तर-

2. अचल को ऐसा क्यों लगा कि किसी ने उसके दिल को मुट्ठी में दबोचकर मसल दिया हो ?

उत्तर-

3. अचल को रात में नींद क्यों नहीं आई?

उत्तर-

4. अचल ने कक्षा के साथियों द्वारा उसकी हँसी उड़ाने की प्रवृति का विरोध कैसे किया?

उत्तर-

5. साहस के पैर शीर्षक कहानी के माध्यम से कहानीकार पाठकों से क्या कहना चाहता है ?

उत्तर-

6. कहानी का प्रधान चरित्र ‘अचल’ का व्यक्तित्व अपनी चुनौतियों के साथ हमें बेहद प्रभावित करता है। क्यों ?

उत्तर-

7. किसने किससे कहा?

उत्तर-

क. “बैठो बेटे! बैठे रहो। यह सब कैसे हो गया?”

उत्तर-

ख. “दोस्तो ! भूगोल के मास्टर जी आते हैं तो अपने साथ नक्शा लाते हैं।”

उत्तर-

ग. “रहने दो अचल! अगले स्टेशन पर ले लेंगे।”

उत्तर-

घ. “बा अदब! बा मुलाहिजा ! होशियार ! शहंशाह तैमूर लंग तशरीफ ला रहे हैं।”

उत्तर-

ङ “क्यों बे, तुझे तैमूर लंग नाम पसंद आया क्या?”

उत्तर-

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