मनोरमा कक्षा 8वीं

गीतागगोदकम् gitaggodakam

(श्री कृष्ण जी के श्रीमुख से निकली गीता एक अनुपम ग्रन्थ है, जिसका प्रत्येक शब्द पीयूष है। इसी उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए छात्रों के अध्ययनार्थ गीता के इन श्लोकों का संकलन किया गया है।)


  श्लोकाः 

(1) अभ्यासयोगयुक्तेन चेतसा नान्यगामिना ।। परमं पुरुष दिव्यं याति पार्थानुचिन्तयन् ।।

(2) पत्र पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति । तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मनः ।।

(3) अहं वैश्वानरो भूत्वा प्राणिनां देहमाश्रितः । प्राणापानसमायुक्तः पचाम्यन्नं चतुर्विधम् ।।

(4) सुख दुःखे समे कृत्वा लाभालाभो जयाजयी। ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापमवाप्स्यसि ।।

(5) सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेक शरणं व्रज | अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः ।।

(6) विहाय कामान्यः सर्वान्पुमा चरति निःस्पृहः । निर्ममो निरहङ्कारः स शान्तिमधिगच्छति ।।

(7) कुलक्षये प्रणश्यन्ति कुलधर्माः सनातनाः । धर्मे नष्टे कुलं कृत्स्नमधर्मोऽभिभवत्युत।।

(8) न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते। तत्स्वयं योगसंसिद्ध कालेनात्मनि विन्दति ॥

(9) ईश्वर सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति । भ्रमयन्सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया ।।


शब्दार्थाः


चेतसा = चित्त से नान्यगामिना = (न अन्य गामिना) दूसरी ओर न जाने वाला। अनुचिन्तयन् = निरन्तर चिन्तन करते हुए याति = प्राप्त होता है। पार्थ अर्जुन। तोयम् = जल प्रयच्छति अर्पण करता है, देता है। प्रयतात्मनः = सगुण रूप से प्रगट होकर। अश्नामि = खाता हूँ। समायुक्तः = संयुक्त चतुर्विधम् = चार प्रकार के पचामि = पचाता हूँ। वैश्वानरो वैश्वानर अग्नि रूप युज्यस्व तैयार रहो, जुड़ जाओ। अवाप्स्यसि = प्राप्त करोगे परित्यज्य = त्याग कर शरणं व्रज = शरण हो जाओ। मोक्षयिष्यामि = मुक्त कर दूँगा मा शुचः शोक मत कर विहाय त्यागकर कामान् = इच्छाओं को कामनाओं को निर्ममो = ममतारहित निरहङ्कारः = अहंकार रहित। अधिगच्छति = प्राप्त होता है। क्षये नष्ट होने पर प्रणश्यन्ति = नष्ट हो जाते हैं। कृत्स्नं = सम्पूर्ण अभिभवति = फैल जाता है। उत बहुत सदृशम् के समान । इह = संसार । योगसंसिद्धः = कर्मयोग के द्वारा पूर्ण सिद्ध किया हुआ आत्मनि = अपने आप ही आत्मा में विन्दति = पा लेता है। सर्वभूतानाम् = सभी प्राणियों के हृददेशे = हृदय प्रदेश में। तिष्ठति = स्थित है। भ्रमयन् = भ्रमण कराता हुआ यन्त्रारूढानि = यन्त्र में आरूढ हुए।


अर्थ:


(1) हे पार्थ! यह नियम है कि परमेश्वर के ध्यान के अभ्यास रूप योग से युक्त, दूसरी ओर न जाने वाले चित्त से निरन्तर चिन्तन करता हुआ मनुष्य परम प्रकाश रूप दिव्य पुरुष को अर्थात् परमेश्वर को ही प्राप्त होता है।

(2) जो कोई भक्त मेरे लिये प्रेम से पत्र, पुष्प, फल, जल आदि अर्पण करता है। उस शुद्ध बुद्धि निष्काम प्रेमी भक्त का प्रेमपूर्वक अर्पण किया हुआ वह पत्र-पुष्पादि को मैं सगुण रूप से प्रगट होकर प्रीति सहित खाता हूँ।

(3) मैं ही सब प्राणियों के शरीर में स्थित रहने वाला प्राण और अपान से संयुक्त वैश्वानर अग्निरूप होकर चार (भक्ष्य, भोज्य, लेहय, चोष्य) प्रकार के अन्न को पचाता हूँ।

(4) जय-पराजय, लाभहानि सुख-दुःख को समान समझकर उसके बाद युद्ध के लिये तैयार हो जा इस प्रकार युद्ध करने से तुझे पाप नहीं लगेगा।

(5) सम्पूर्ण धर्मों को अर्थात् सम्पूर्ण कर्तव्यकर्मों को मुझमें त्याग कर तू केवल एक मुझ सर्वशक्तिमान, सर्वाधार परमेश्वर की ही शरण में आजा मैं तुझे सम्पूर्ण पापों से मुक्त कर दूंगा, तू शोक मत कर

(6) जो पुरुष सम्पूर्ण कामनाओं को त्याग कर ममता रहित, अहंकार रहित और स्पृहारहित हुआ विचरता है वह शान्ति प्राप्त करता है।

(7) कुल के नाश से सनातन कुल-धर्म नष्ट हो जाते हैं, धर्म के नष्ट हो जाने पर सम्पूर्ण कुल में पाप भी बहुत फैल जाता है।

(8) इस संसार में ज्ञान के समान पवित्र करने वाला निःसन्देह कुछ भी नहीं है। उस ज्ञान को कितने ही काल से कर्मयोग के द्वारा शुद्धान्तःकरण हुआ मनुष्य अपने आप ही आत्मा में पा लेता है।

(9) हे अर्जुन! शरीर रूप यन्त्र में आरूढ़ हुए सम्पूर्ण प्राणियों को अन्तर्यामी परमेश्वर अपनी माया से उसके कर्मों के अनुसार भ्रमण कराता हुआ सब प्राणियों के हृदय में स्थित है।


अभ्यासप्रश्नाः


संस्कृत भाषा में निम्नांकित प्रश्नों के उत्तर दीजिए।-

(क) भक्ताः ईश्वरं प्रति कि कि अर्पयन्ति ?

उत्तर- भक्ताः ईश्वर प्राप्त्यर्थ भोगेन चेलसा च चिन्तनं कुर्वन्ति

(ख) सत्पुरुषाः सुखदुःखे किं मन्यन्ते ?

उत्तर- सतपुरुषाः सुख दुख सर्म मन्यन्ते । सन्पुरुष सुख दुख सेनो को समान मानते हैं।

(ग) मुक्तेः उपायः कः ?

उत्तर- सर्वधर्मानि परिन्यज्य इश्विरस्य शरणे गमनमेव भुक्तेः उपायम (सभी धर्मों अर्थात सम्पूर्ण को न्यामकर ईश्वर के शरण में जाना ही मुक्ति का आय है। .

(घ) कः पुरुषः शान्तिमाधिगच्छति ?

उत्तर- कः पुरुषः सवनि, भ्रमान विहाय विस निर्ममों निरहर चरति सः एवं शान्तिमधिगच्छति विहाय (जो पुरुष सभी कामनाओ को त्यागकर सा रहित (लालच रहित) ममला रहित कामनाओ

(ङ) धर्मे नष्टे किं भवति ?

उत्तर- धर्मे नष्टे कुल विनास्थति

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