हिंदी छत्तीसगढ़ भारती

आतिथ्य ( श्री भदंत आनंद कौशल्यायन ) Hospitality (Shri Bhadant Anand Kaushalyayan)

जैसे जीवन पथ पर, वैसे ही साधारण सड़क पर आदमी के लिए अकेले चलना कठिन है। कोई ठहरकर किसी पीछे आनेवाले का साथी हो लेता है, कोई चार कदम तेज चलकर आगे जानेवाले का। लेकिन मुझे उस दिन किसी को आवाज देने की भी फुर्सत नहीं थी। किसी साथी की आशामयी प्रतीक्षा में मैं जरा दम लेने के बहाने भी न ठहर सकता था। कारण, उस दिन मेरे सिर पर भूत सवार था। मैंने निश्चय किया था अपने चलने के सामर्थ्य की परीक्षा करने का।

रास्ते चलते प्यास लगती। कुछ देर ठहरकर पानी पीना चाहिए- साधारण नियम है। मैं इस नियम का पालन कहीं नहीं करता। पानी मिलते ही पी लेता और चल देता।

रास्ते चलते से मैं पूछता, “क्यों भाई, आगे कोई ठहरने लायक गाँव है ?” लोग किसी गाँव का नाम बतलाते। मैं वहाँ न ठहरता। यही लालच था कि दो-तीन किलोमीटर और हो जाए। आगे एक कस्बे का पता लगा सोचा. आज वहाँ तक तो जरूर पहुँचेंगे। रात हो चली, पर तब उस कस्बे तक पहुँचने की धुन थी।

किसी ने बताया कि उस कस्बे में एक हाई स्कूल है; उसके हेडमास्टर भले आदमी हैं। यह सुनकर मैंने सोचा कि यदि मिलेगा तो गरम-गरम पानी से पैर घोऊँगा। हो सकता है, गरम तेल भी मलने को मिल जाए और कहीं गरम दूध मिल गया, तो क्या कहना। लगभग 5-6 किलोमीटर का सफर तय कर चुकने पर थककर चूर हो जाने पर एक बार बैठकर फिर जल्दी से उठने की आशा मन में न रहने पर, ऐसी इच्छा क्या अनधिकार चेष्टा समझी जाएगी? जो हो, उस रात मैं ऐसा ही हिसाब लगाता हुआ उन हेडमास्टर के बंगले पर जा पहुँचा। बैंगला कस्बे के बाहर था। हेडमास्टर साहब के बंगले पर पहुँचकर मैंने वैसे ही दस्तक दी, जैसे कोई अपने घर के दरवाजे पर देता है। हेडमास्टर साहब! हेडमास्टर साहब! कहकर पुकारा दरवाज़ा खुला अंदर से एक सज्जन लालटेन लिए हुए निकले। मुझे उस समय अपनी पड़ी हुई थी। मैं उनकी शक्ल-सूरत, कद को क्या निरखता! वे ही मेरी शक्ल को अच्छी तरह पहचानने की कोशिश करते हुए बोले, “क्या है?”

“”मैं एक विद्यार्थी हूँ, ऐतिहासिक महत्व के स्थानों को देखने के विचार से पैदल यात्रा कर रहा हूँ। आज की रात, आज्ञा हो, तो आपके यहाँ काटना चाहता हूँ।” आशा के ठीक विपरीत जवाब मिला, “हर्गिज नहीं।” मेरी सब अक्ल गुम हो गई। अपने

को सँभालते हुए मैंने निवेदन किया, “यहाँ कोई परिचित नहीं, रात अंधेरी है। पहली बार इस बस्ती में आया हूँ। कहाँ जाऊँ?”

“यहाँ आस-पास कई चोरियाँ हो गई हैं। हम अपने घर किसी को नहीं ठहरने देते।”

“आपके बरामदे में पड़े रहने की आज्ञा दे दीजिए। सुबह होते ही मैं अपना रास्ता लूँगा।”

“नहीं, ऐसा नहीं हो सकता। बस्ती में एक धर्मशाला है, वहाँ चले जाओ।”

“मैं आज बहुत चला हूँ। थककर चूर हो रहा हूँ। एक कदम भी और चलने की सामर्थ्य नहीं है। फिर इस अँधेरे में कैसे, कहाँ धर्मशाला को खोजता फिरूँ?” जा रे, इसे धर्मशाला का रास्ता दिखा आ!” कहकर हेडमास्टर ने एक आदमी को मेरे साथ कर दिया।

थकावट के दुःख से भी अधिक दर्द था मर्माहत अभिमान का दो-चार कदम चल मैंने उस आदमी से किंचित् रोषभरे शब्दों में कहा, “जाओ, तुम लौट जाओ। जो बीतेगी सहेंगे। धर्मशाला का रास्ता स्वयं ढूँढ लेंगे।”

आदमी शायद यही चाहता भी था। वह लौट गया और मैं अपनी समझ में धर्मशाला की ओर चल दिया, बिना यह जाने कि धर्मशाला किस ओर है। पूरब घूमा, पश्चिम घूमा, दक्षिण घूमा, कहीं कुछ पता न लगा। काफी देर इधर-उधर भटकते रहने पर एक टिमटिमाता हुआ चिराग दिखाई दिया। सोचा, वहाँ कोई होगा, चलकर पूछा जाए धीरे-धीरे पहुँच ही गया। देखा-दीपक का प्रकाश खिड़की में से आ रहा है। दरवाजे पर फिर दस्तक देनी पड़ी। दरवाज़ा खुलते ही आवाज़ आई, “क्या है?” जब तक मैं उत्तर दूँ, मुझे सुनाई पड़ा, “अरे! तुम फिर आ गए?” मैंने गर्दन उठाई। वही हेडमास्टर साहब थे, जिनके घर से थोड़ी ही देर पहले अपना सा मुँह लेकर विदा हुआ था। बात यह थी कि इधर-उधर घूमते मुझे दिशा-भ्रम हो गया और मैं कोल्हू के बैल की तरह, जहाँ से चला था वहीं फिर आ पहुँचा।

“दौडो दौड़ो! देखो, इसे अभी निकाला था. अब यह पिछवाड़े की तरफ से आया है।” हेडमास्टर साहब की चिल्लाहट सुनकर दो ही चार मिनट में आस-पास के लोगों ने मुझे घेर लिया। कोई कहता, पुलिस को बुलाओ।” कोई कहता, “नहीं, थाने में ही ले चलो।” जो कुछ न कहता. वह चार चपत लगाने का प्रस्ताव तो कर ही देता। मेरी अक्ल हैरान थी, क्या करूँ, क्या न करूँ। बुरा फैसा था कैसे विश्वास दिलाता कि मैं चोर नहीं हूँ। लोग कहते, देखिए न अंधेर है, अभी-अभी निकाला था, फिर इतनी जल्दी हिम्मत की है। उन्हें क्या मालूम, जो उनके लिए अंधेर है, वही मेरे लिए महाअंधेर है। विपत्ति पड़ने पर कहते हैं, अक्ल मारी जाती है। लेकिन जब आदमी को और कोई सहारा नहीं रहता, तब बुद्धि ही उसके काम आती है तब मैंने स्वयं को दीवार के सहारे खड़ा करने की कोशिश करते हुए कहा, “देखिए, मैं दूर से चलकर आया हूँ। थकान से चकनाचूर हूँ। आप मुझे बैठने के लिए जगह दीजिए और फिर ठंडे पानी का गिलास फिर बैठकर कृपया मेरी बात सुन लीजिए। यदि आप लोगों को विश्वास हो जाए कि मैं चोर नहीं हूँ, तो कृपया एक बार फिर अपना आदमी दे दीजिए, मुझे धर्मशाला का रास्ता दिखा देने के लिए और विश्वास न हो तो थाने में भेज दीजिए या और जो चाहे कीजिए। वे लोग बुरे आदमी न थे और बुरे आदमी में क्या भलाई नहीं होती? मेरी बात सुन ली गई। एक स्टूल बैठने के लिए दिया गया और पानी का एक गिलास भी। मैंने स्थिरता से बैठकर हल्के-हल्के पानी पिया और अपना थैला खोलकर उसमें से दो चिट्ठियाँ निकालीं। दोनों परिचय पत्र थे। एक था ग्वालियर पुरातत्व विभाग के निदेशक के नाम और दूसरा निजाम हैदराबाद के प्रधान मंत्री महोदय के नाम दोनों से मेरा साधारण परिचय था और यदि वे मुझ अज्ञानी यात्री की कुछ सहायता कर सकें तो धन्यवाद के दो शब्द

हाँ, तो मैंने परिचय पत्र दिखाते हुए कहा, “यदि ये पत्र किसी चोर के पास हो सकते हैं तो मैं चोर हूँ और यदि इन पत्रों के रखने वाले के चोर न होने की कुछ संभावना है तो मैं चोर नहीं हूँ।” लोगों की आपस में फुसफुस हुई और चाहे मैं कोई भी होऊँ निश्चय हुआ, मुझे धर्मशाला ही भेजने का वही आदमी मेरे साथ कर दिया गया और उसके पीछे-पीछे मैं ऐसे चलने लगा जैसे अखाड़े में हारा हुआ कोई पहलवान। धर्मशाला पहुँचा तब पता लगा कि दरवाज़ा बंद हो चुका है और अब किसी तरह नहीं खुल सकता।

“”यही धर्मशाला है”, कहकर वह आदमी मुझे छोड़कर चलता बना। अब क्या करूँ-कहाँ जाऊँ? धर्मशाला में बाहर की ओर एक बरामदा था। मैंने उसी में रात काटने की सोची। पास में कपड़ा काफी नहीं था। तो क्या? सर्दी जोरों से पड़ रही थी। तो क्या ? और कोई चारा नहीं था। अँधेरे में अंदाज करके मैं एक कोने में बैठ जाना चाहता था कि आवाज़ आई. “कौन है?” मैंने कहा, “मुसाफिर।”

“इतनी रात गए आए हो?”

“हाँ भाई, आज ऐसी ही बीती।”

“इधर आ जाओ, उधर हवा लगेगी।” कहते हुए उस अपरिचित आवाज़ ने मुझे अपने

पास के कोने में बुला लिया “तुम कहाँ से?” “तुम कहाँ से?” मैंने पूछा

“हम तो भिखमंगे हैं दिखाई नहीं देता।”

अंधे भिखमंगे के पास लेटने का जीवन में पहला अवसर था। “कितने पैसे मिले, क्या खाने को मिला?” कुछ ऐसे ही सवाल मैंने पूछे। लेकिन मैं तो व्यग्र था अपनी सुनाने के लिए उसे सुननेवाला मिला था पहले-पहले मुझे वही अंधा

अथ से इति तक मैंने कह सुनाई। उस सहानुभूति के साथ, जो एक दुखिया को दूसरे दुखिया से होती है, वह अघा मेरी बात सुनता रहा। राम कहानी खत्म हुई, तब अंधेरे में टटोलते हुए उसने पूछा, “कहाँ हैं तुम्हारी टाँगें? उन्हें जरा दबा दूँ।”

मैंने कहा “न यार, रहने दो।”

“अच्छा, यह बताओ तुम्हारे पास कोई कपड़ा है?”

“है।”

“कहाँ? मुझे दो।”

मेरे पास वही एक साफा था, गज-डेढ़ गज का टुकड़ा। मैंने दे दिया। अंधे ने अपने हाथों से मेरी टाँगों को टटोला और नीचे से ऊपर तक कसकर बाँध दिया। उसने कहा, “अब थोडी देर ऐसे ही बैठे रहो।” गहरी सहानुभूति दिखाने वाले की आज्ञा का उल्लंघन आसान नहीं। होता। मैं मूर्तिवत् बैठा रहा। थोड़ी देर बाद उसने मेरी टाँगें खोल दीं। रुका हुआ खून तेजी से दौड़ता मालूम हुआ, थकावट जाती रही बातें करते-करते नींद आ गई। सुबह उठा तब देखा मेरा साथी मुझसे पहले ही उठकर चला गया था।


अभ्यास


1. लेखक के द्वारा की गई पदयात्रा का कारण क्या था ?

उत्तर-

2. हेडमास्टर जी ने लेखक को अपने घर पर न ठहरने की क्या वजह बताई ?

उत्तर-

3. थकावट के दुःख से भी अधिक दर्द था मर्माहत अभिमान का लेखक द्वारा इस तरह कहे जाने का क्या कारण हो सकता है?

उत्तर-

4. थके हुए लेखक के मन में हेडमास्टर जी के घर ठहरने को लेकर कौन-कौन सी भावनाएँ उठ रही थीं ?

उत्तर-

5. हेडमास्टर से मिलने से पूर्व और उसके बाद में लेखक के मनोभावों में क्या परिवर्तन हुआ?

उत्तर-

6. परिचय-पत्र देखकर हेडमास्टर के विचारों में किस प्रकार का परिवर्तन हुआ होगा? सोचकर लिखिए।

उत्तर-

7. लेखक चोर नहीं था, इस बात का विश्वास दिलाने के लिए उसने क्या किया?

उत्तर-

8. लेखक के अनुसार जीवन के पथ पर अकेले चलना क्यों कठिन है ?

उत्तर-

9. “गहरी सहानुभूति दिखाने वाले की आज्ञा का उल्लंघन आसान नहीं होता इस पंक्ति के द्वारा लेखक अपने दुखिया भिक्षुक मित्र के किन भावों को बताना चाहता है?

उत्तर-

10. “उन्हें क्या मालूम कि जो उनके लिए अँधेर है, वह मेरे लिए महाअँधेर है।” लेखक ने महाअँधेर किसे कहा है?

उत्तर-

Related Articles