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मिनी महात्मा ( श्री आलम शाह खान ) Mini Mahatma (Shri Alam Shah Khan)

बात जरा-सी थी पर मोहन था कि रोए चला जा रहा था। लोग समझा-समझाकर थक गए कि बड़े छोटों को पीटते चले आए हैं. अगर पुलिस अंकल ने उसके एक चपत लगा भी दी तो क्या हो गया? कौन सा पहाड़ टूट पड़ा उस पर? बड़े हैं, पड़ोसी हैं प्यार भी करते हैं, अच्छे-बुरे में भी काम आते हैं, पर वह अब रोते-रोते मुँह बिसूरने लगा था, उसकी हिचकियाँ बैध गई।

“अरे भाई, बड़े हैं, जरा जल्दी होगी, किसी ने उन्हें नहीं टोका। एक तुम्हीं उनके आड़े आ गए।” “क्योंकि उनकी गलती थी। बड़ों ने नहीं टोका उन्हें और मैंने टोक दिया तो मुझे पीट दिया, क्यों? कोई बड़ा उन्हें रोकता टोकता तो क्या वह उसके चाँटा जड़ देते? नहीं तो मुझे इसलिए पीट दिया कि मैं बच्चा हूँ, छोटा और कमजोर हूँ।”

लोग भी तरह-तरह की बातें कर रहे थे “लड़का जिरह किए जाता है, इसे कौन समझाए?” “रोता है, रोने दो कब तक रोएगा?” “अभी थककर आप चुप हो जाएगा।”

“चलो जी. चलो सब-इंस्पेक्टर साहब आप भी चलें सुबह-ही-सुबह रोनी सूरत सामने पड़ी। छुट्टी का दिन न बिगड़ जाए।” इतना कह सुनकर दूध के बूथ के आगे खड़े लोग बिखर गए। दूध खत्म होने पर दूधवाला भी बूथ बंद कर चला गया। पर वह वहीं खड़ा रोता रहा- रोता रहा; टस से मस न हुआ। सूरज की किरणें चमकने पर भी जब वह घर न पहुँचा तो उसकी माँ ने इधर-उधर पूछा। पड़ोस के गुल्लू ने सारी बातें बतलाई सुनकर माँ उस बूथ के पास गई, तो वह उनसे लिपट गया। हिचकियाँ भरकर रोने लगा। माँ ने भी वही कहा, जो सबने कहा था।”अरे बेटा! बड़े हैं, बाप बराबर, तनिक चपतिया दिया तो क्या हो गया? कौन तीर तान दिया? चुप भी हो जा अब।” “मार दिया तो कुछ नहीं, बड़े हैं, और मार दें, पर मेरा कसूर तो बताएँ। बप्पा को कारखाने में यूनियनवालों ने मारा: वे अस्पताल में पड़े हैं। उनका कोई कसूर होगा, पर मुझे क्यों मारा।

मेरी क्या गलती थी, क्या कसूर था?”

“अब जिद मत कर, तूने दूध भी नहीं लिया तेरे बप्पा को अस्पताल नाश्ता देने जाना है। तुझे याद नहीं?”

“मैं नहीं जाऊँगा। कहीं नहीं जाऊँगा। जाऊँगा तो पुलिस अंकल के घर।” “मान भी जा बेटे, मैं उनसे कह दूंगी कि आगे से ऐसा सुलूक न करें बच्चों के साथ।”

“पर जो दो चाँटे मुझे जड़ दिए उनका क्या?” उनका क्या? अब चुप भी हो ले, नहीं तो मैं भी लगा दूँगी. चल।”

“तो तुम भी क्यों चूको लगा दो।” “मैं कहती हूँ घर चल अस्पताल जाना है, अब उठ भी।”

“मैं नहीं आता, पुलिस अंकल के घर जाकर पूछूंगा उनसे कि मेरा कसूर बताइए।” “नहीं आता तो जा मर कहीं।” इतना कह माँ सिर पर पल्ला बैंककर वहाँ से चल दीं। ट्रिन…..ट्रिन… ट्रिन घंटी घनघनाई। थोड़ी देर बाद दरवाजा खोला तो पाया- भीगी आँखें लिए सामने मोहन खड़ा है। उसे देखकर शेरसिंह सकपकाए।

“अंकल! आपने मुझे क्यों मारा? मेरा कसूर क्या था?” सुबकते हुए उसने वही सवाल पूछा। “किसने मारा? किसको? मैं कुछ नहीं जानता।” “आपने मारा मुझे। आखिर क्यों मारा?” “जा, मारा तो मारा। दफा हो जा यहाँ से, नहीं तो और पिट जाएगा। चल खिसक” वे गरजे।

“मारो.. और मारो, पर मैं नहीं जाऊँगा, जब तक आप यह नहीं बताएँगे कि मेरा कसूर क्या

था…” वह भी कड़ककर बोला अब आसपास के घरों की मुंडेरों से दस-पाँच चेहरे उभर आए।

देखा, बरामदे के सामने मुँह बिसूरता मोहन खड़ा है और अपने बरामदे में झल्लाए, शेरसिंह

“जाएगा भी यहाँ से, या दो-एक चपत खाकर ही टलेगा।”

“आप जो चाहें करें। जब तक मेरा कसूर नहीं बताएँगे, मैं यहाँ से नहीं जाऊँगा।”

“अजीब उजड्ड-ढीठ लड़का है।” एक पड़ोसी ने कहा। “देखिए, आप इसे समझाएँ, अगर यहाँ से दफा नहीं हुआ तो मैं इसे कोतवाली में बंद करवा दूँगा,” शेरसिंह गरजे।

“आप जो चाहें सो करें, पर मेरा कसूर बताएँ, जिससे मैं आगे ऐसा कुछ न करूँ कि बड़ों को मुझ पर हाथ उठाना पड़े? मोहन बोला।

“अभी तो बस तू इतना कर कि यहाँ से दफा हो जा। नहीं तो…” वे भन्नाए। सच पड़ोस का लिहाज है, वरना इस बच्चू को वह सबक सिखाता कि “शेरसिंह कुढ़कर बोले। परसों ही वे नायक से तरक्की लेकर असिस्टेंट सबइंस्पेक्टर बने थे।

“मैं सबक सीखने ही आया हूँ। आप मुझे बताएँ कि कतार तोड़नेवाले को टोकना कोई पाप है?

“यार, इस लड़के पर कौन-सा भूत सवार है? किसी भी तरह नहीं मानता।’ इतना कहकर शर्मा जी नीचे उतरे। वर्मा जी भी साथ आए और उसे पुचकारकर दिलासा देते बोले, बहुत हो गया, बेटे मोहन! अब छोड़ो भी और घर चले जाओ।”

आप सच मानें, मेरी हेठी नहीं हुई, अगर अंकल ने पीट दिया… और लगा दें दो-चार पर बताएँ तो कि आखिर क्यों मारा मुझे?” कुत्ते की दुम टेढ़ी की टेढी कहा न भाई बड़े हैं।”

बड़े तो आप सब है। सभी पीट दें, मैं कुछ नहीं बोलूँगा लेकिन इतना बताएँ कि क्यों? सिर्फ इसलिए कि मैं छोटा हूँ, कमजोर हूँ।”

“नहीं नहीं यह बात नहीं तुमसे कोई बदतमीजी हुई होगी। इसलिए, बस।”

“तो यह बता दें कि क्या बदतमीजी हुई?

“जा, जा कुछ नहीं हुआ। पीट दिया हमने, कर ले जो कुछ करना हो;” अब शेरसिंह के भीतर बैठा पुलिसवाला बोला।

“ठीक है, तो मैं यहीं बैठा हूँ। आपके फाटक के बाहर।”

“बैठ या मर, हमारी बला से” शेरसिंह ने कहा। तभी उनकी घरवाली बाहर आई और उसने सामने खड़े लोगों के हाथ जोड़कर वहाँ से जाने को कहा और मोहन की बाँह थाम भीतर ले गई। “अब बोल बेटा! क्या गजब हो गया? अगर इन्होंने एक-आध लगा भी दी, तो क्या हुआ? जैसे हमारी अमरित, वैसा तू चल मुँह घो, कुल्ला कर और नाश्ता कर ले, उठ!”

“आंटी! आपकी बात सर आँखों पर पर अंकल बताएँ तो?” “अब क्या बताएँ • समझ ले कि गुस्सा आ गया।” “तो बस बाहर पाँच पड़ोसियों के सामने यही कह दें।” भई, तू तो बहुत जिद्दी है. इससे क्या हो जाएगा?”

“मुझे तसल्ली हो जाएगी कि मैंने ठीक काम किया था।” “मैं कहती हूँ कि तुमने गलती नहीं की, ठीक किया।” “आपने कहा, माना पर पीटा तो अंकल ने सबके सामने।”

“बस, बस रहने दो अपनी भलमनसाहत। यह नाचीज मुझे अपने घर में अपने बच्चों के सामने, अपमानित करना चाहता है,” शेरसिंह गुराए। “इसमें क्या हुआ जो हेठी होती है आपकी?”

“तुम रुको, मैं इसे अभी धक्के मार-मार बाहर कर देता हूँ।” इतना कहकर शेरसिंह आगे बढ़े। “आप क्यों हलाकान होते हैं अंकल, मैं खुद ही चला जाता हूँ आपके घर से।” मोहन ने इतना कहा और हाथ जोड़कर बाहर आ गया, पर गया नहीं। फाटक पर ही घुटनों में सिर रखकर बैठ गया।

उधर वह पुलिस की नई वर्दी पहनकर तैयार होने लगे।

“सुनिए, वह लड़का अभी तक फाटक पर डटा है, कह दो कि गुस्सा आ गया था क्यों जगत में डंका पिटवाते हो कि बित्ते-भर का छोकरा थानेदार के दर्जे के सरकारी अफसर के दरवाजे पर सत्याग्रह किए बैठा है। कहीं अखवारवालों को भनक पढ़ गई तो तिल का ता बनेगा फिर आज गांधी जयंती भी है।” “क्या कहती हो, उसके आगे गिड़गिड़ाऊ, कहूँ कि मेरे बाप बख्शो। तभी सबको सन्मति

दे भगवान, ईश्वर अल्लाह तेरे नाम की गूंज सुनाई दी खिड़की से झाँका तो देखा-लड़के झंडे और तख्तियाँ उठाए प्रभातफेरी पर निकले है। असिस्टेंट सबइंस्पेक्टर भीतर खड़े थे और मोहन बाहर उनके फाटक पर डटा था, तभी लड़कों की टोली आ पहुँची। वहाँ अपने साथी को गठरी बना बैठे देखा तो सब वहीं रुक गए।

“क्या हुआ?” “मोहन यहाँ?”

“क्यों बैठा है?”

चलो इसे भी साथ लो. इसे भी तो एक तख्ती बनानी थी।”

“चलो मोहन, प्रभातफेरी में यहाँ बैठे क्या कर रहे हो? आगे वाले बड़े लड़के ने उसे बाँह थामकर उठाया, तो देखा, उसकी आँखें सूजकर लाल हो गई हैं और अभी भी उसकी आँखों से आँसू बह रहे हैं। “अरे क्या हुआ इसे?” सभी के मुँह से निकला।

तभी एक लड़के ने जो सुबह दूध लेने आया था. सारी बात बताई और कहा कि मोहन सुबह

से इस बात पर अड़ा है कि अंकल बताएँ उसने ऐसा क्या कसूर किया था, जो उन्होंने उसे पीट दिया सब समझाकर हार गए, पर यह यहाँ से टलता ही नहीं। “मोहन! तुम्हारी तख्ती का पन्ना कहाँ है ? कल तो हेकड़ी बघार रहे थे कि गांधी जी की वह बात चुनूँगा कि

“वह तो यह रहा, लो पढ़ो,” कहकर मोहन ने एक कागज आगे बढ़ा दिया। उस पर लिखा

था “अत्याचार को सहना उसे बढ़ावा देना है।”

“ठीक है, गाँधी जयंती पर गांधी जी की एक बात को सही करके दिखाएँ।” इतना बोल एक बड़े लड़के ने तिरंगा ऊँचा करते हुए जोर से कहा “दोस्तो! अंकल को सफाई तो देनी ही होगी हम सब यहीं रुके। बोली- महात्मा गांधी की जय अंकल, बाहर आइए और आस-पास ऐसे ही नारे गूंजने लगे।

अब तो मोहल्ले भर के लोग भी वहाँ जमा हो गए। नारे गूंजते रहे। मोहन हाथ जोड़कर फाटक के आगे खड़ा रहा। थोड़ी देर बाद बाबा फरीद फाटक खोलकर भीतर गए और शेरसिंह जी के साथ बाहर आए। फिर सबको स्नेह से देखते हुए बोले, “प्यारे बच्चो! सुनो, अंकल तुमसे कुछ कहना चाहते हैं, इतना कहकर वे पीछे हट गए।

अब सामने पुलिस अंकल आए और कहने लगे, “अच्छा बच्चो आज सुबह मुझसे एक ज्यादती हो गई। मैं अत्याचार कर बैठा। गुस्से में मैंने मोहन पर हाथ उठा दिया। कसूर मेरा ही था। मैं शर्मिन्दा हूँ।” इतना सुनना था कि मोहन ने आगे बढ़कर अंकल के चरण छुए और जोर से नारा लगाया, “अंकल, जिन्दाबाद!”


अभ्यास-

1. वह जरा सी बात क्या थी, जिसकी वजह से मोहन लगातार रोये जा रहा था ?

उत्तर-

२. “जा-जा कुछ नहीं हुआ। पीट दिया हमने कर ले जो कुछ करना है।” अब शेर सिंह के भीतर बैठा ‘पुलिसवाला बोला इस कथन में पुलिसवाला लिखने के पीछे लेखक का क्या भाव है ?

उत्तर-

3. सबके समझाने के बाद भी मोहन घर क्यों नहीं जा रहा था ?

उत्तर-

4. शेर सिंह की पत्नी ने लोगों से क्या और कैसे कहा ?

उत्तर-

5. मोहन ने अपने व्यवहार में विरोध को शामिल कर साबित किया कि अत्याचार को सहना उसे बढ़ावा देना है। कैसे ?

उत्तर-

6. लड़का जिरह किए जाता है। इसे कौन समझाए ? लोग किस आधार पर ऐसा कह रहे थे?

उत्तर-

7. इस पाठ में कुछ वाक्य ऐसे हैं जिनमें बालकों की बात पर ध्यान न देने का भाव छिपा है। ऐसे चार वाक्य पाठ में से छाँटकर लिखिए।

उत्तर-

8. बात मान भी जा बेटे मैं उनसे कह दूँगी, आगे से ऐसा सुलूक न करें बच्चों के साथ। लिखिए इस वाक्य में

  • मैं किसके लिए आया है ?
  • उत्तर-
  • ‘उनसे किसके लिए आया है ?
  • उत्तर-
  • ‘ऐसा सुलूक कहकर किस सुलूक की बात कही गई है ?
  • उत्तर-
  • मान भी जा बेटे में कौन-सा भाव छिपा है ?
  • उत्तर-

9. कहानी में आए निम्नलिखित पात्रों के बारे में आपने जो राय बनाई हो, उसे पात्रवार चार-पाँच पंक्तियों में लिखिए।

उत्तर-

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