हिंदी छत्तीसगढ़ भारती

नई उषा ( श्री सत्यनारायण लाल )

उठो, नई किरण लिए जगा रही नई उषा उठो, उठो नए संदेश दे रही दिशा-दिशा।

खिले कमल अरुण, तरुण प्रभात मुस्करा रहा,

गगन विकास का नवीन, साज है सजा रहा।

उठो, चलो, बढ़ो, समीर शंख है बजा रहा,

भविष्य सामने खड़ा प्रशस्त पथ बना रहा।

उठो, कि सींच स्वेद से करो धरा को उर्वरा, कि शस्य श्यामला सदा बनी रहे वसुंधरा

अमय चरण बढ़ें समान फूल और शूल पर, कि हो समान स्नेह, स्वर्ण, राशि और धूल पर।

सुकर्म, ज्ञान, ज्योति से स्वदेश जगमगा उठे, कि स्वाश्रयी समाज हो कि प्राण-प्राण मा उठे।

सुरभि मनुष्य मात्र में भरे दिवेक ज्ञान की, सहानुभूति, सख्य, सत्य, प्रेम, आत्मदान की।

प्रवाह स्नेह का प्रत्येक प्राण में पला करे, प्रदीप ज्ञान का प्रत्येक गेह में जला करे। उठो, कि बीत है चली प्रमाद की महानिशा, उठो, नई किरण लिए जगा रही नई उषा


शब्दार्थ :- स्वेद पसीना, शस्य धान, अन्न, उर्वरा उपजाऊ, विस्तृत व्यापक, सुकर्म अच्छा कार्य स्वाश्रयी स्वयं पर आश्रित, सुरभि सुगंध सख्य सखा या मित्र भाव, आत्मदान- बलिदान, गेहघर प्रमाद आलस्य, महानिशा गहन रात्रि, रात्रि का मध्य भाग


अभ्यास


 पाठ से 

1. नई उषा से कवि का क्या अभिप्राय है?

उत्तर-

2. सभी मनुष्यों में किन-किन गुणों का विकास होना चाहिए?

उत्तर-

3. कविता में कवि के प्राण प्राण गा उठे कहने का क्या आशय है ?

उत्तर-

4. समाज को स्वाश्रयी कैसे बनाया जा सकता है?

उत्तर-

5 नई उषा शीर्षक कविता में कवि किन-किन परिवर्तनों की ओर संकेत करता है?

उत्तर-

6. कविता में वर्णित वसुंधरा शस्य श्यामला सदा कैसे बनी रह सकती है? स्पष्ट कीजिए।

उत्तर-

7. प्रमाद की महानिशा बीतने से कवि का क्या तात्पर्य है ?

उत्तर-

8. प्रस्तुत कविता नवयुवकों के मन में किन-किन भावों का संचार कर रही है ?

उत्तर-

9. यह कविता नवयुवकों को क्या संदेश दे रही है?

उत्तर-

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