मनोरमा कक्षा 8वीं

नीतिनवनीतम् nitinavneetam

  1. यस्मिन् जीवति जीवन्ति बहवः सः तु जीवति । कुरुते किं न काकोऽपि चञ्च्चा स्वोदरपूरणम्।।

2. यो ध्रुवाणि परित्यज्य अध्रुवाणि निषेवते। ध्रुवाणि तस्य नश्यन्ति अघुवं नष्टमेव हि ।।

3. जननी जन्मभूमिश्च जाहवी च जनार्दनः । जनकः पञ्चमश्चैव जकाराः पञ्चदुर्लभाः ।।

4. अहिं नृपं च शार्दूलं किटिञ्च बालक तथा परश्वानं च मूर्ख च सप्त सुप्तान न बोधयेत् ।।

5. विद्यार्थी सेवकः पान्यः क्षुधार्तो भयकातरः । भण्डारी प्रतिहारी च सप्त सुप्तान् प्रबोधयेत् ।।

6. कामं क्रोघं तथा लोभं स्वादं शृङ्गारकौतुके । अति निद्राम् अति सेवा च विद्यार्थीह्यष्ट वर्जयेत् ।। वर प्राणपरित्यागो मानभङ्गेन जीवनात्।

7. प्राण त्यागे क्षणं दुःखं मानभङ्गे दिने-दिने ।। प्रियवाक्यप्रदानेन सर्वे तुष्यन्ति जन्तवः |

8. तस्मात्तदेव वक्तव्यं वचने का दरिद्रता ।। दुष्टा भार्या शठ मित्रं भृत्यश्चोत्तरदायकः ।

9. ससपे च गृहे वासो मृत्युरेव न संशयः ।।

10. मूल भुजङ्ग शिखरं प्लव शाखा विहङ्ग कुसुमानि भृङ्गै । आसेव्यते दुष्टजनैः समस्तैर्न चन्दनं मुञ्चति शीतलत्वम् ।।


शब्दार्थाः


यस्मिन् = जिसके जीवति = जीवित रहने पर बहवः बहुत से, जीवन्ति = जीते हैं, सः तु जीवति = वह तो जीता है, काकोऽपि = (काक+अपि) कौआ भी. किम् = क्या, चञ्च्चा = चाँच से, स्वोदर (स्व+उदर) अपना पेट, पूरणम् = पूर्ति (भरना), न = नहीं, कुरुते = करता है।

ध्रुवाणि = स्थिर या निश्चित वस्तुओं को, परित्यज्य = छोड़कर, अध्रुवाणि = अस्थिर या अनिश्चित वस्तुओं को, निषेवते सेवन करता है, नश्यन्ति = नष्ट हो जाते हैं, अधुवम् = अनिश्चित नष्टमेव = नष्ट ही है। जननी = माता, जाहवी = गङ्गा जनार्दन ईश्वर, जनकः = पिता, पञ्चमश्चैव = (पञ्चमः +च+एव) = ये पाँचों, जकारा = जवर्ण से प्रारम्भ होने वाले शब्द दुर्लभाः

दुर्लभ है। अहि = सर्प, शार्दूल = सिंह, किटिञ्च = बर्र (मधुमक्खी) बालकम् = शिशु परश्वानं = दूसरे का कुत्ता, सुप्तान् = सोते हुए न = नहीं, बोधयेत् जगाना चाहिये। विद्यार्थी विद्याअर्जन करने वाला, सेवकः = सेवा करने वाला, पान्थ पथिक, राहगीर क्षुधार्थी = भूखा व्यक्ति, भयकातर = डरा हुआ, भण्डारी = भण्डार गृह का रक्षक, प्रतिहारी = द्वारपाल, प्रबोधयेत् = जगा देना चाहिये। शृङ्गार = सजना, कौतुक = खेल, अतिसेवा = अति आनन्द,

वरम् = श्रेष्ठ, प्राणपरित्यागे = मृत्यु मानभङ्गेन = अपमानित जीवनात् = जीवन से, प्रियवाक्य = मधुर वचन, तुष्यन्ति प्रसन्न होते हैं, जन्तवः = प्राणी, दरिद्रता = गरीबी। दुष्टभार्या दुराचारिणी स्त्री, शठं मित्रम् = दुष्ट मित्र भृत्यश्चोत्तरदायकः = (मृत्यः+च+उत्तरदायक) जवाब देने वाला नौकर ससपें सर्पयुक्त। = मूलम् = जड़, भुजङ्ग = सर्पों से, शिखरम् = चोटी, प्लवङ्ग = बन्दरों से, शाखा = डाल, विहङ्ग = पक्षियों से, भृङ्गै भ्रमरों से आसेव्यते = सेवित होता है (आश्रय लिया जाता है), दुष्ट जनैः = दुष्ट जनों से, मुञ्चति = छोड़ता है, शीतलत्वम् = शीतलता को ।


अर्थ


जिसके जीवित रहने पर बहुत से (प्राणी) जीते हैं, उसी का जीना सार्थक है अन्यथा क्या कौआ भी चोंच से अपने उदर की पूर्ति नहीं करता है।

जो निश्चित वस्तुओं को छोड़कर अनिश्चित वस्तुओं को अपनाता है उसकी निश्चित वस्तु भी नष्ट हो जाती है।

अनिश्चित तो स्वयं ही नाशवान है।

जननी जन्मभूमि, जाहवी (गङ्गा), जनार्दन (ईश्वर) और जनक (पिता) ये ज अक्षर से प्रारंभ होने वाले पाँचों दुर्लभ हैं।

सर्प, राजा, सिंह, बर्र (मक्खी) शिशु दूसरे का कुत्ता और मूर्ख ये सातों सोते हो तो नहीं जगाना चाहिए।

विद्यार्थी, सेवक, राहगीर, भूखा व्यक्ति, डरा हुआ, भण्डारी, और द्वारपाल ये सातों सोते हो तो इन्हें जगा देना चाहिए।

काम, क्रोध, लोभ, स्वाद, शृङ्गार, खेल, अतिनिद्रा और अति आनन्द ये आठों विद्याध्ययन के शत्रु है अतः विद्यार्थी को इन्हें छोड़ देना चाहिए।

अपमानित होकर जीने से मृत्यु श्रेष्ठ है। मृत्यु में एक बार दुःख होता है किन्तु मान हानि

से हमेशा दुःख होता रहता है। मधुर वचन से सब जीव सन्तुष्ट होते हैं इसलिये वैसा ही बोलना चाहिए वचन में क्या दरिद्रता है ?

जिस घर में दुष्टास्त्री, कपटी मित्र, जवाब देने वाला नौकर और साँप का वास हो वहाँ मृत्यु निश्चित है।

चन्दन के मूल में सर्प रहते हैं, शिखर पर बन्दर रहते हैं शाखाओं पर पक्षी तथा पुष्पों पर भ्रमर रहते हैं इस प्रकार समस्त दुष्ट प्राणियों से सेवित होने पर भी चन्दन अपनी शीतलता को नहीं छोड़ता है।


अभ्यासप्रश्नाः


प्रश्नों के उत्तर संस्कृत में लिखिए –

(क) क. वस्तुतः जीवति ?

उत्तर-

(ख) कान् सुप्तान प्रबोधयेत् ?

उत्तर-

(ग) के पञ्चदुर्लभा ?

उत्तर-

(घ) कस्य ध्रुवाणि नश्यन्ति ?

उत्तर-

(ङ) प्रियवाक्य किमर्थ वक्तव्यम् ?

उत्तर-

(च) विद्यार्थिनि कति दोषाः त्याज्याः ?

उत्तर-

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