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तृतीय लिंग का बोध sense of third gender

इस काल के संबंध में जो तथ्य मिलते हैं यद्यपि उसका ऐतिहासिक प्रमाण नहीं है फिर भी प्राचीन पौराणिक कथाओं के माध्यम से यह जानकारी जरूर मिलती है कि इस काल में लोग इस समुदाय के प्रति काफी सकारात्मक थे। इस काल की कथाओं में तृतीय लिंग समुदाय के पात्र काफी आदर्शवादी थे। रामचरित मानस, भागवत, महाभारत व अन्य पुराणों में अनेक बार किन्नरों का उल्लेख मिलता है। किंवदंती है कि त्रेतायुग में श्रीराम जब 14 साल के लिए वनवास जा रहे थे तब अयोध्यावासी सरयू नदी तक उन्हें छोड़ने आए थे। नदी के तट पर श्रीराम ने 14 साल बाद उन्हें फिर से मिलने का आश्वासन देकर वापस घर जाने का निर्देश दिया। कहा जाता है राम की आज्ञा पाकर किन्नरों को छोड़कर सभी नर-नारी वापस लौट आए थे। 14 साल बाद जब श्रीराम वापस आए तो उन्होंने देखा कि सरयू के तट पर कई किन्नर उनका इंतजार कर रहे थे। जब उन्होंने इसका कारण पूछा तो किन्नरों ने बताया कि 14 साल पहले आपने केवल नर और नारी को ही वापस लौटने की आज्ञा दी थी सो वे लौट गए। हम किन्नर हैं अतः हम यहीं रुक गए और आपका इंतजार करने लगे। कहते हैं श्रीराम ने उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर आशीर्वाद दिया था कि कलयुग में उनका राज होगा और उनकी दुआएँ लोगों को लगेंगी। इसी तरह रामचरितमानस, पुराणों व महाभारत में कई बार किन्नरों द्वारा महत्वपूर्ण अवसरों पर गायन और वादन करने के संकेत मिलते हैं।

द्वापर युग का शिखंडी नामक पात्र इस समुदाय के लिए एक कालजयी पात्र सिद्ध हुआ है। महाकाव्य महाभारत में शिखंडी का उल्लेख मिलता है। शिखंडी महाराज द्रुपद का पुत्र व द्रोपदी का भाई था जो किन्नर था। उसे कहीं-कहीं सती का अवतार भी कहा गया है। शिखंडी ने अपनी शिक्षा-दीक्षा विधिवत पूरी की थी और इस पात्र ने यह सिद्ध कर दिया कि किन्नर समुदाय के लोग दुनिया के बड़े से बड़े कार्य कर सकते हैं। कहा जाता है कि शिखंडी ने धर्म की रक्षा के लिए महाभारत का युद्ध लड़ा था। उसकी प्रतिभा को देख श्रीकृष्ण ने उसे महाभारत के युद्ध में सेनापति बनाया था। गीता के पहले अध्याय में लिखा है कि ‘शिखंडी च महारथः अर्थात महारथी था। उपर्युक्त कथाएँ इस बात की प्रमाण है कि उस काल में इस समुदाय को काफी सामाजिक मान्यता मिली हुई थी। ये कथाएँ काल्पनिक या ऐतिहासिक हैं, यह यद्यपि बहस का विषय हो सकता है पर इन कथाओं को समाज में जिस प्रकार स्वीकृति मिली इससे प्रमाणित होता है कि उस काल में थर्ड जेंडर समुदाय के व्यक्तित्व के विकास के लिए उपयुक्त व्यवस्था थी।

मध्यकाल इस काल के संबंध में कुछ ऐतिहासिक प्रमाण मिलते हैं। यह वह काल था जब बाहर के राजाओं ने भारत पर आक्रमण किया। इन आक्रमणों से काफी कुछ क्षति हुई वहीं कई क्षेत्रों में सांस्कृतिक विविधता का भी विकास हुआ। वे अपने साथ अपने देशों की संस्कृति सभ्यता लेकर यहाँ आए थे। इससे हमारी संस्कृति काफी समृद्ध हुई। कुछ मुसलमान राजाओं ने थर्ड जेंडर समुदाय के लोगों को अपने महलों में राजकुमारियों व रानियों के अंगरक्षकों के रूप में रानिवास में नियुक्त किया। मध्यकालीन ऐतिहासिक दस्तावेजों से जानकारी मिलती है कि कुछ मुगल राजाओं ने किन्नरों को गुप्तचर विभाग व सेना विभाग में भी कार्य करवाया।

इसी तरह कई मुगल राजाओं ने किन्नरों को बहुत इज्जत से आश्रय दिया था। गान व नृत्य कलाओं के ये विशारद हुआ करते थे। इस काल में बनी परंपराओं का आज भी दैहारों (किन्नरों के आश्रम) में पालन होता है। लगातार आक्रमण और राजनैतिक अस्थिरता के चलते किन्नर अपने आपको असुरक्षित मानने लगे। कई आक्रमणकारियों का दृष्टिकोण इनके प्रति अच्छा नहीं था। इन संकटों से छुटकारा पाने के लिए अब किन्नर अलग-अलग रहने के बजाय एकत्रित होकर रहने लगे। इसी सुरक्षा और आश्रय की भावना से ही गुरु-शिष्य परंपरा का विकास हुआ। दैहार में रहने वाले मुस्लिम धर्म का पालन करते थे। दैहार में किन्नर पवित्रता व अनुशासन का जीवन बिताते थे। वहाँ वे किन्नर अपने गुरुओं से नृत्य व गायन में पारंगत होते.

थे। अपनी अस्मिता की रक्षा के लिए वे ज्यादातर बाहर नहीं निकलते थे, केवल अपने आजीविका के लिए साल में एक-दो बार बधाई माँगने निकला करते थे। आज किन्नर जिस कोथपन भाषा का प्रयोग करते हैं वह फारसी से आई है। चूंकि भाषा व विशिष्ट संस्कृति का विकास संगठन की प्रक्रिया से जुड़ी हुई होती है अतः इस काल में किन्नरों की विशेष भाषा (कोथपन) का प्रचलित होना यह बताती है कि वे समूहों में रहना सीख रहे थे। संभवतः बधाई माँगने व एकत्रित रहने की परंपरा इसी काल में पनपी है। कहा जाता है कि मध्यकाल में अजमेर नामक स्थान में एक बड़े मुस्लिम संत रहा करते थे, जो अजमेर के ख्वाजा नाम से प्रसिद्ध भी हुए। उन्होंने एक किन्नर की भक्ति से प्रसन्न होकर उसे पुत्ररत्न का वरदान दिया था। उस घटना की याद में आज भी बाबा के उर्स के वक्त किन्नर बड़ी संख्या में अजमेर में चादर चढ़ाने पहुँचते हैं।

आधुनिक काल

तृतीय लिंग समुदाय ने आधुनिक काल में भी अनेक कीर्तिमान रचे हैं। आधुनिककाल की चुनौतियाँ अन्य कालों की अपेक्षा काफी अलग रहीं अब दुनिया सिमट चुकी है। विज्ञान, औद्योगिकीकरण व राजनीतिक विचारधाराओं ने लोगों के मस्तिष्क के द्वार खोल दिए हैं। अब लोग अपने अंतर्संबंधो के विषयों में खुलकर बातें करने लगे हैं। समुदाय के कई लेखकों ने अपने यौन संबंधों व प्रेम प्रसंगों के बारे में काफी खुलकर लिखना शुरु भी कर दिया। यौन व्यवहार को समाज में मान्यता दिलाने के लिए राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अनेक संगठन बनने लगे हैं। इसमें नाज, यूनीसेफ मित्र श्रृंगार हम सफर व दक्षिण भारत में थर्ड जेंडर वेलफेयर सोसाइटियों का गठन हुआ। सुप्रीम कोर्ट ने जैसे ही धारा 377 में संशोधन किया, काफी लोग खुलकर सामने आने लगे। राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण संगठन ने थर्ड जेंडर समुदाय के लोगों के स्वास्थ्य व अन्य अधिकारों के लिए लक्ष्यगत हस्तक्षेप परियोजनाएँ चलाई। इसके तहत भी लोग संगठित होने लगे। थर्ड जेंडर के यौन व्यवहारों पर इतनी बारिकियों से काम हुआ कि इस समुदाय के अंतर्गत पाई जाने वाली विभिन्नताओं का परिचय मिला। इन विभिन्न समूहों को अलग-अलग नाम भी दिया गया जैसे किन्नर, टीजी आदि। यहाँ एक बात उल्लेख करना आवश्यक है कि अब किन्नर उसे कहा जाता है जो नारी वेश में पवित्रता व अनुशासन की जिंदगी जीते हैं। अतः किन्नर एक आदर्शवादी नाम हो गया।

तृतीय लिंग समुदाय के लोगों ने कार्पोरेट, समाजसेवा, राजनीति, फैशन, संगीत व अन्य क्षेत्रों में लोहा मनवाया। इनकी प्रतिभा को देख लोग दाँतों तले उंगली दबाने के लिए मजबूर हो गए। सिल्वेस्टर मरचेन्ट, लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी, मनेन्द्र सिंह गोयल, फैशन डिजाइनर रोहित व विधायक शबनम मौसी आदि प्रमुख हैं। इस प्रकार हम देख सकते हैं कि इस समुदाय के अंदर कई क्षमताएँ और प्रतिभाएँ छिपी हुई हैं। समुदाय को मुख्यधारा से जोड़ना बहुत जरुरी है ताकि इनकी प्रतिभा व शक्ति का उपयोग समाज को श्रेष्ठ और सुंदर बनाने में किया जा सके। अतः हमें ऐसी सामाजिक व्यवस्था का निर्माण करना बहुत जरुरी है, जहाँ तृतीय लिंग समुदाय का प्रत्येक व्यक्ति अपने संपूर्ण व्यक्त्वि का विकास कर सके। हमारी भारतीय संस्कृति सदैव ही “सर्वे भवन्तु सुखिनः सहनाववतु सहनौ भुनक्तु के आदर्शों पर विकसित हुआ है। विश्व का कल्याण तभी संभव है जब यहाँ रहने वाले हर व्यक्ति को अनुकूल वातावरण मिल सके। केवल तृतीय लिंग समुदाय ही नहीं बल्कि कई ऐसे वर्ग हैं जो विकासक्रम में पीछे हो गए हैं, उन्हें पुनः उसी विकास की गति से जोड़ना बहुत जरूरी है।


अभ्यास


1. राम के वन गमन के प्रसंग में किन्नरों के बारे में किस कथा का वर्णन मिलता है?

उत्तर-

2. शिखंडी कौन थे और क्यों प्रसिद्ध हुए ?

उत्तर-

3. राम वनवास से वापस लौटते हुए किन्नरों को क्या आशीर्वाद दिए ?

उत्तर-

4. दैहार क्या है ?

उत्तर-

5. तृतीय लिंग को किन अन्य नामों से जानते हैं ?

उत्तर-

6. तृतीय लिंग के लोगों ने किन-किन क्षेत्रों में प्रसिद्धि प्राप्त की है?

उत्तर-

7. विकासक्रम में पीछे कौन से वर्ग है और क्यों ?

उत्तर-

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