मनोरमा कक्षा 8वीं

सुभाषितानि subhashitani

subhashitani सुभाषितानि

  1. यथा खनन् खनित्रेण नरोवार्यधिगच्छति। तथा गुरुगतां विद्या शुश्रूषुरधिगच्छति ।।

2. आचार्यो ब्रह्मणो मूर्तिः पिता मूर्तिः प्रजापतेः । माता पृथिव्याः मूर्तिस्तु भ्राता स्वोमूर्तिरात्मनः ।।

3. आदौ माता गुरोः पत्नी ब्राह्मणी राजपत्निका।  धेनुर्धात्री तथा पृथ्वी सप्तैता मातरः स्मृताः ।।

4. अन्नदाता भयत्राता विद्यादाता तथैव च । जनिता चोपनेता च पञ्चैते पितरः स्मृताः ।।

5. सत्यं माता पिता ज्ञान धर्मो भ्राता दया सखा । शान्तिः पत्नी क्षमापुत्रः षडेते मम बान्धवाः ।।

6. रूपयौवनसम्पन्ना विशालकुलसम्भवाः । विद्याहीना न शोभन्ते निर्गन्धाइव किंशुकाः ।।

7. नमन्ति फलिनो वृक्षाः नमन्ति गुणिनो जनाः। शुष्कवृक्षाश्च मूर्खाश्च न नमन्ति कदाचन ।।

8. को नायाति वशं लोक मुखे पिण्डेन पूरितः । मृदङ्गेऽपि मुख लेपेन करोति मधुरध्वनिः ।।

9. पयसा कमलं कमलेन पयः पयसा कमलेन विभाति सरः ।

मणिना वलयं वलयेन मणिः मणिना वलयेन विभाति कर ।

शशिना च निशा निशया च शशी शशिना निशया च विभाति नमः ।

कविना च विभुः विभुना च कवि कविना विभुना च विभाति सभा ।।

10. नरके गमन श्रेष्ठ दावाग्नौ दहनं वरम् । वरं प्रपतनं चाब्धी न वर परशासनम् ।।


शब्दार्थाः


खनन् = खोदता हुआ, खनित्रेण = कुदाल से, नरोवार्यधिच्छति (नरः + वारि + अधिगच्छति), नरः = मनुष्य, वारि= जल, अधिगच्छति = प्राप्त करता है, तथा उसी प्रकार, गुरुगताम् = गुरु में विद्यमान, शुश्रूषु = गुरु की सेवा में लगा हुआ। ब्रह्मणः = ब्रह्म का मूर्ति शरीर, (स्वरूप), प्रजापतेः = ब्रह्मा का पृथिव्याः = पृथ्वी का, स्वः = अपना, (सगा) । आदौमाता = सगी माँ (जिसके गर्भ से जन्म हुआ), गुरोः = गुरु की, ब्राह्मणी = ब्राह्मण की पत्नी, राजपत्निका = राजा की पत्नी, धात्री = धाय माँ ( दूध पिलाने वाली दाई), सप्तैता = (सप्त+ऐता) ये सात, स्मृताः =कही गयी हैं।

अन्नदाता = अन्न या भोजन देने वाला भयत्राता = भय से बचाने वाला, जनिता = जन्म देने वाला (सगा पिता), चोपनेता = (च+उपनेता) और उपनयन (यज्ञोपवीत) संस्कार करने वाला।

बान्धवा = परिवार,

विशालकुल = उत्तमकुल, सम्भवाः = उत्पन्न, निर्गन्धा = सुगन्धहीन, इव = के समान, किशुका = टेसू के फूल,

नमन्ति = झुकते हैं, मूर्खाः = मूर्ख लोग, कदाचन् = कभी नहीं, शुष्क = सूखा, नायाति = (न+आयाति) नहीं आता है, पिण्डेन = भोजन से पूरितः = भर देना ।

पयसा = जल से, विभाति = शोभा देता है, वलयम् = कंगन, विभु = स्वामी राजा ।

दावाग्नौ = जंगल की आग, प्रपतन डूबना परशासनम् = परतंत्रता।


अर्थ


कुदाल से खोदता हुआ मनुष्य जैसे जल प्राप्त करता है, उसी प्रकार गुरु की सेवा में लगा हुआ (मनुष्य) गुरु में विद्यमान विद्या प्राप्त कर लेता है। आचार्य ब्रह्म का स्वरूप है।

पिता ब्रह्मा का स्वरूप है। माता पृथ्वी का स्वरूप है और भाई अपना ही स्वरूप है।

अपनी जननी, गुरु-पत्नी, ब्राह्मण-पत्नी, राजा की पत्नी, गाय, धात्री (धाय माँ) और पृथ्वी- ये सात माताएँ कही गयी हैं।

अन्न देने वाला, भय से बचाने वाला, विद्या पढ़ाने वाला जन्म देने वाला और यज्ञोपवीत आदि संस्कार करने वाला ये पाँच पिता कहे गए हैं।

सत्य मेरी माता है ज्ञान पिता है, धर्म भाई है, दया मित्र है, शान्ति स्त्री है और क्षमा पुत्र है। ये छः मेरे बान्धव (परिवार) हैं।

जो विद्याहीन हैं, वे यदि रूप और यौवन से सम्पन्न हो तथा उच्च कुल में उत्पन्न हुए हों तो भी गन्धहीन टेसू के फूल की तरह शोभा नहीं पाते।

फलदार वृक्ष झुक जाते हैं। गुणवान लोग झुक जाते हैं।

सूखे वृक्ष और मूर्ख लोग कभी नहीं झुकते।

इस संसार में कौन (मुख में) भोजन देने से वश में नहीं आ जाता है। क्योंकि मृदङ्ग के मुख में लेप करने से वह भी मधुर ध्वनि करता है।

जल से कमल, कमल से जल, जल कमल से है शोभा सर की।

मणि से कंगन कंगन से मणि, मणिकंगन से शोभा कर की। शशि से निशा, निशा से शशि शशि निशा से है शोभा नभ की। कवि से राजा राजा से कवि, कवि राजा से शोभा सभा की।

नरक में जाना श्रेष्ठ है, जंगल की आग में जल जाना अच्छा है, समुद्र के अगाध जल में डूब जाना भी उत्तम है किन्तु परतन्त्र रहना अच्छा नहीं है।


अभ्यासप्रश्नाः


नीचे लिखे प्रश्नों के उत्तर संस्कृत में दीजिए-

(क) कः गुरुगतां विद्याम् अधिगच्छति ?

उत्तर- शुश्रुषुः गुरुगली विद्याम अधिगच्छति

(ख) माता कस्याः मूर्ति ?

उत्तर- माता पृथिया: मूर्तिः ।

(ग) निर्गन्धा किशुकाः इव के न शोभन्ते ?

उत्तर- विधाहीनाः निर्मान्धा: किंशुकाइप न शोभते

(घ) मृदङ्गे मुखलेपेन किं करोति ?

उत्तर- मृदने पि मुखलेफेन मधुर ध्वनि करोति

(ङ) सर: केन विभाति ?

उत्तर- सरा पयसा उमलेन च विभाति । सरोवर उमल और जल से सुशोभिल होता है।

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