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जो मैं नहीं बन सका ( डॉ. ज्ञान चतुर्वेदी )

मैं आज एक डॉक्टर हूँ तथा लेखक भी, परंतु बचपन में मैं न तो डॉक्टर बनना चाहता था, न ही लेखक बचपन में मैं न जाने क्या-क्या बनना चाहता था। आज मैं आपको बचपन की उन अजीब तथा मजेदार इच्छाओं के विषय में बताऊँगा।

मुझे जहाँ तक याद आता है. सबसे पहले जिस व्यक्ति से मैं बुरी तरह प्रभावित हुआ था, वह एक पेंटर था। हमारे गाँव की एकमात्र फट्टा टॉकीज नई-नई खुली थी और लंबी जुल्फोवाले गाँव के नौजवान गेटकीपर बन गए थे। मैं तब कक्षा पाँच का विद्यार्थी था। मैंने अपने पिद्दी जीवन की पहली टॉकीज देखी थी और मैं उसका दीवाना हो गया था। मैं स्कूल से भागकर टॉकीज पर घंटों खड़ा रहता और नई फिल्म के बोर्ड बनते देखता रहता। तब मैं गेटकीपर के अलावा जिस हस्ती पर कुर्बान था वह फिल्म का बोर्ड बनाने वाला पेंटर था फिल्म हर दो-तीन दिन में बदल जाती थी, सो पेंटर लगभग प्रतिदिन वहाँ बैठा पोस्टर बनाता रहता था। मैं उसकी किस्मत पर रश्क करता और सोचता कि मैं भी बस जीवन भर बोर्ड बनाऊँगा। क्या मस्त जीवन है। बोर्ड बनाओ और दिन भर टॉकीज पर रहो। परंतु बाद में मैंने उसी पेंटर को टॉकीज़ के मैनेजर के सामने दस रुपए एडवांस के लिए गिड़गिड़ाते देखा तो उस दिन से मेरा भ्रम उसके विषय में टूट गया। मैंने तय किया कि मैं पेंटर नहीं बनूँगा। तब तक यूँ भी मेरी नजर गेटकीपरी के भव्य धंधे पर पड़ चुकी थी।

मुझे लगता कि जिंदगी तो बस गेटकीपर की है, शेष मनुष्य तो पशुओं-सा जीवन जी रहे हैं। गेटकीपर की भी क्या शान है। तीनों शो मुफ्त फिल्म देख रहे हैं। मुझे यह बात किसी ईश्वरीय वरदान की भाँति लगती थी कि कोई मनुष्य तीनों शो में रोज़ फिल्म देखें। मैंने तय कर लिया कि मैं जीवन में गेटकीपर बनकर ही रहूँगा। इधर मेरी पढ़ाई चौपट हो रही थी, उधर मैं फटेहाल-सा बनकर स्थानीय लक्ष्मी टॉकीज के मैनेजर से मिल रहा था। उस बेचारे ने मुझे अनाथ समझकर, शामवाले शो के लिए गेटकीपर रख लिया। दूसरे ही दिन जिस आदमी का पहला टिकट मुझे फाड़ने का अवसर मिला, वे और कोई नहीं स्वयं मेरे पूज्य पिता जी थे। उन दिनों पिताओं के बीच अपने बच्चों को पीटने का जबरदस्त रिवाज था। पिता जी ने मुझे मारा, मैनेजर को मारा, दो गेटकीपरों को मारा और मारते-मारते मुझे घर लाए। टॉकीज़ का मैनेजर मेरे पिता जी से क्षमा माँगता रहा कि उसे पता नहीं था कि यह सरकारी अस्पताल के डॉक्टर साहब का लड़का था।

इसी चक्कर में मैं छठी की छमाही परीक्षा में फेल हो गया, जिसके उपलक्ष्य में मेरी और पिटाई हुई। इस प्रकार गेटकीपरी का भूत मेरे सर से उतरा।

मैंने अब पढ़ाई में मन लगाया। धीरे-धीरे मुझे लगने लगा कि मुझे हेडमास्टर बनना चाहिए। दुनिया का सबसे रुआबदार धंधा यही लगने लगा मुझे अधिक काम भी नहीं। बस, सुबह-सुबह प्रार्थना के समय मूँछ लगाकर बच्चों के सामने खड़े हो जाओ, प्रार्थना के बाद दस-बारह बच्चों को तबीयत से झापड़ रसीद करो और अपने कमरे में बैठ जाओ। बीच-बीच में कमरे से निकलकर पुनः इस उस क्लास में घुसकर बच्चों पर आघात हमले करो और शाम की घण्टी बजते ही छाता उठाकर रास्ते के बच्चों को मारते हुए घर चले जाओ। मैंने तय कर लिया कि जिन्दगी में हेडमास्टर ही बनना है। यही सोचकर मैं नकली मूँछों की तलाश में बाजार घूमने लगा और पिटाई की प्रैक्टिस अपने छोटे भाइयों पर करने लगा। परंतु इसी बीच एक बार जिला शिक्षा अधिकारी ने अपने दौरे पर हम लोगों के सामने ही हेडमास्टर साहब को ऐसा फटकारा कि मेरा सारा उत्साह भंग हो गया। मैंने अब हेडमास्टर बनने की इच्छा त्यागी और

स्कूल की घंटी बजानेवाला चपरासी बनने की ठानी। मैंने सोचा कि अब तक मैं बेकार ही भटकता रहा। अरे, जिंदगी तो इसकी है। जब चाहा घंटी बजाकर स्कूल की छुट्टी करा दी। बाकी टाइम बैठकर बीड़ी या सिगरेट पीते रहे। मुझे लगता कि इस धंधे में बीड़ी पीने से कोई नहीं रोकेगा, वरना तो एक बार में छिपकर पिता जी की सिगरेट पी रहा था, तो उन्होंने पकड़ लिया था और मारपीट पर उतर आए थे तब मेरी समझ में नहीं आया था कि जो चीज़ पिता जी इतने शौक से पीते थे उसे हमें मना क्यों करते थे। वह तो बाद में पिता जी को दिल का दौरा पड़ा तब सिगरेट की हानियों समझ में आईं।) खैर, तो मैं इतने लाभों को देखते हुए घंटी

बजानेवाला चपरासी होना चाहता था। परंतु एक दिन मैंने देखा कि घंटीवाले को नौकरी से निकाल दिया गया क्योंकि उसकी नौकरी बीस वर्ष के बाद भी कच्ची थी और उसकी जगह एक नया आदमी आ गया जो हेडमास्टर साहब के घर मुफ्त में पानी भरा करता था। बड़ा रोया वह, पर किसी ने न सुनी उसकी मेरा एक और सपना टूटा।

मुझे तब लगने लगा कि यदि मैं पहलवान होता, तो ऐसे अन्याय करनेवालों की चटनी बना देता। परंतु मैं बहुत ही दुबला-पतला था उन दिनों हम पिकनिक पर जाते तो मैं बनियान या कमीज पहनकर ही नदी में नहाने के लिए उतर जाता क्योंकि मेरी सींकिया काठी को देखकर मित्र हँसते थे। फिर भी मैंने शरीर बनाने की तरफ कोई ध्यान न दिया होता यदि तभी मेरे दादा जी गाँव से न आए होते। वे अंग्रेजों के समय के अडियल, रिटायर्ड पुलिस ऑफिसर थे। उनके कहने से मैंने सुबह-सुबह चने खाकर दौड़ने की ठानी। अफवाह यह थी कि ऐसा करने से भी व्यक्तित्व पहलवान हो जाता है। मैं दो दिन तो ठीक-ठाक दौड़ लिया। तीसरे दिन एक मरियल सा. परंतु फुर्तीला कुत्ता मेरे पीछे दौड़ने लगा। उसने मुझसे प्रेरणा ली या उसके दादा जी भी पुलिस में जासूसी कुत्ता रहे थे. कह नहीं सकता। मैं कुत्ते से बचने के लिए उस दिन बहुत दौड़ा और शायद और दौड़ता रहता यदि सड़क से सटा हुआ वह गड्ढा न होता।

कुत्ता कुछ मजाकिया भी था। वह गड्ढे के किनारे तक आकर मुँह बनाकर भौ-भाँ करके हँसता रहा और वापस चला गया। मैं राणा साँगा की तरह यहाँ-वहाँ से घायल हो गया। लँगड़ाते हुए घर लौटने में मैंने तय किया कि पहलवानी में शरीर की तोड़फोड़ के कई अवसर रहते हैं। मैं तोड़फोड़ के खिलाफ था। मैंने पहलवान बनने का इरादा त्याग दिया।

इसी बीच गाँव में मेला लगा और उसमें एक जादूगर के खेल के बड़े चर्चे होने लगे। मैंने पहलवानी की याद में घावों पर मलहम का लेप लगाया और जादूगर का खेल देखने तंबू में घुस गया। वाह क्या खेल था। मैंने तड़ाक से तय कर डाला कि मुझे जीवन में जादूगर ही बनना है। बढ़िया चमकीली शेरवानी पहनकर, रंगीन छींटदार साफा लगाए वह जादूगर जादू की छड़ी पानी के गिलास पर घुमाकर चुरेरेट बोलता और पानी की चाय बन जाती। उसने चुरेट बोल-बोलकर कागज के नोट बनाए, लड़के को बकरा बनाया, लड़की को हवा में उड़ाया, खाली हाथ में हवा से लड्डू पैदा किया और खाली डिब्बे में से कबूतर निकाले। मैं अभिभूत हो गया। यह हुई न बात मैं उस दिन चुरेट बोलता हुआ घर वापस आया। स्कूल में हेडमास्टर साहब का कमरा खाली पाकर मैंने उनकी मेज़ से चमकीली काली छड़ी उठा ली, जिसकी मार द्वारा वे बिना चुट बोले ही हम लोगों को मुर्गा बनाया करते थे। मैं छड़ी लेकर सुबह-सुबह जादूगर के तंबू पर जा पहुँचा। सोचा था कि उनसे प्रार्थना करूँगा कि मुझे भी जादू सिखा दें। जादू सीखकर मैं हेडमास्टर साहब को बकरा बनाना चाहता था। मैंने तंबू में झाँककर देखा जादूगर अपने लड़के को डाँट रहा था कि पैसे की इस कदर तंगी है और तू लड्डू खरीदकर पैसे फूँक आया। मैले-कुचले कपड़ों में टूटी खाट पर पड़े उस जादूगर को रुपयों के लिए रोते देखकर मैं दंग रह गया। जो शख्स कागज से रुपए तथा हवा से मिठाई बना लेता हो, उसकी यह दुर्दशा ! मुझे वास्तविकता के इस कठोर संसार ने गहरा धक्का पहुँचाया और मेरा यह सपना भी टूटा।

इसके बाद जैसे-तैसे मैं बड़ा हुआ, तो मैंने जीवन को बहुत पास से देखा। इसके असर से मैंने कविताएँ तथा कहानियाँ लिखनी शुरू कर दीं। मैंने तय किया कि मैं लेखक बनूँगा। परन्तु आज भी जब मुझे याद आता है कि मैं बचपन में इन सबके अलावा बस ड्राइवर हलवाई, दर्जी, सड़क कूटनेवाले इंजिन का इंचार्ज, थानेदार नौटंकी का डांसर, सर्कस का जोकर, आइसक्रीम बेचनेवाला आदि-आदि सब कुछ एक साथ बनना चाहता था तो बड़ी याद आती है अपनी किशोर उम्र की क्या दिन थे वे भी।


शब्दार्थ:- पिद्दी-छोटा तुच्छ, रश्क- किसी दूसरे को अच्छी दशा में देखकर होनेवाली जलन या कुढ़न, डाह, कुर्बान-बलि, निछावर फटेहाल – विपन्न, चिथड़ा-चिथड़ा, रूआबदार- रौबीला, अड़ियल-हठी, रुकनेवाला, तंबू-कपड़े, टाट, कैनवास, आदि का बना हुआ वह बड़ा घर जो खंभों और खूँटों पर तना रहता है और जिसे एक स्थान से उठाकर दूसरे स्थान तक आसानी से ले जाया जा सकता है, अभिभूत-गहरे रूप में प्रभावित वशीभूत


अभ्यास


 पाठ से 

1 जो मैं नहीं बन सका शीर्षक पाठ में लेखक की इच्छा क्या-क्या बनने की थी ?

उत्तर-

2. पॅटर को 10 रुपए एडवांस के लिए गिड़गिड़ाते हुए देख कर लेखक के बालमन में क्या भाव उत्पन्न हुए ?

उत्तर-

3. सिनेमाघर का गेटकीपर बनने को लेकर लेखक के मन में किस प्रकार के भाव थे और क्या परिणाम हुआ ?

उत्तर-

4. लेखक कक्षा 6वीं की अर्द्ध वार्षिक परीक्षा में फेल हो गया। उसके फेल होने के क्या कारण आपको लगते हैं ?

उत्तर-

5. लेखक सबसे पहले किससे प्रभावित हुआ ?

उत्तर-

6. पेंटर को देखकर लेखक के मन में किस तरह का भाव उत्पन्न हुआ ?

उत्तर-

7 घंटी बजानेवाले को नौकरी से क्यों निकाल दिया गया ?

उत्तर-

8. लेखक के जादूगर बनने का सपना कैसे टूट गया ?

उत्तर-

9. प्रस्तुत पाठ में वर्णित जादूगर के दो करतब लिखिए।

उत्तर-

10. निम्नलिखित बातें किस पद के लिए कही गई है

उत्तर-

क. जो शख्स कागज से रुपये तथा हवा से मिठाई बना लेता हो, उसकी यह दुर्दशा

उत्तर-

ख. में राणा सांगा की तरह यहाँ-वहाँ से घायल हो गया।

उत्तर-

ग. इस धंधे में बीड़ी पीने से कोई नहीं रोकेगा।

उत्तर-

घ. जिस आदमी का पहला टिकट मुझे फाड़ने का अवसर मिला, वे और कोई नहीं मेरे पूज्य पिता जी थे।

उत्तर-

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